Kutch Embroidery Identification: कच्छ एंब्रॉयडरी क्यों प्रसिद्ध है? इतिहास, 16 प्रसिद्ध शैलियां, शीशे की कढ़ाई और असली नकली की पहचान कैसे करें ? खरीदने से पहले जानें पूरी जानकारी विस्तार से।
जब बात भारत की पारंपरिक हस्तकलाओं की आती है तो गुजरात के कच्छ से निकलकर आई कच्छ एंब्रॉयडरी का नाम लिया जाता है। रंग-बिरंगे धागों, शीशों की चमक, बारीक हाथ की कढ़ाई से तैयार यह कला केवल कपड़ों की सजाती नहीं है बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति को भी दर्शाती है। यही वजह है कि आज ये हैंडक्राफ्ट केवल भारत नहीं बल्कि विश्वभर में अपनी अलग पहचान बना चुकी है।
कच्छ एंब्रॉयडरी का इतिहास
माना जाता है कच्छ एंब्रॉयडरी 14 वीं सदी के आसपास आई थी, जब सिंध से रबारी समुदाय गुजरात के कच्छ क्षेत्र में आकार बस गए। समय के साथ मध्य एशिया, फारस और अन्य क्षेत्रों की कला का भी इस हस्तशिल्प कड़ा से जुड़ता चला गया। इतना ही नहीं, समय के साथ यह कढ़ाई और भी प्रसिद्ध होती गई और नई शैलियों संग आगे बढ़ती रही।
कच्छ एंब्रॉयडरी कितने प्रकार की होती है?
ज्यादातर कढ़ाइयों में 1 या 5 तरह की शैलियां पाई जाती हैं लेकिन कच्छ एंब्रॉयडरी की खासियत है कि इसे 16 अलग-अलग प्रकार के बुना जाता है, जो प्राचीन, पारंपरिक और मॉडर्न एंब्रॉयडरी का कॉम्बिनेशन पेश करती है। इसमें सबसे ज्यादा, रबारी, आहीर, सूफ, पक्को, खारेक, मुतवा, आरी, मुक्को, जाट, कटरी जैसी शैलियां खूब पसंद की जाती हैं। हर शैली की सिलाई, रंगों का चयन और डिजाइन हमेशा एक-दूसरे से अलग होता है।
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शीशे की कढ़ाई क्यों होती है?
रंगीन धागों के अलावा कच्छ कढ़ाई की सबसे बड़ी खासियत छोटे-छोटे की डिजाइन है। इसका इस्तेमाल केवल खूबसूरत बढ़ाने के लिए नहीं किया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, मिरर वर्क निगेटिव एनर्जी और बुरी नजर से सुरक्षा का प्रतीक माने जाते हैं। यही वजह है कि आज भी गुजराती दुल्हनें, शादी के समय कच्छ एंब्रॉयडरी बेस्ड आउटफिट पहनना पसंद करती हैं।
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GI टैग ने दिलाई पहचान
2013 में कच्छ एंब्रॉयडरी को GI टैग से नवाजा गया। इससे पारंपरिक कला को कानूनी पहचान तो मिली, साथ में स्थानीय कारीगरों की कला को संरक्षण भी मिला। इतना ही नहीं, आज भी कच्छ की हजारों महिलाएं, घर से ही इस पारंपरिक कढ़ाई काम करती हैं।
कच्छ एंब्रॉयडरी की पहचान कैसे करें ?
आजकल बाजार में मशीन से बनी कच्छ एंब्रॉयडरी असल बताकर बेची जाती है। अगर आप इसे खरीदने जा रहे हैं तो इन बातों का ध्यान रखें-
- हाथ की कढ़ाई में टांके अलग-अलग होते हैं
- धागों में लगाई गई गांठें साफ नजर आती हैं
- शीशों को चिपकाया नहीं बल्कि सिले जाते हैं
- कच्छ की कढ़ाई कॉटन नहीं बल्कि सिल्क, हैंडलूम या कपास पर की जाती है।
