22 मई को इस विधि से करें वटसावित्री व्रत, घर में बनी रहेगी सुख-समृद्धि

Published : May 20, 2020, 02:46 PM ISTUpdated : May 20, 2020, 02:48 PM IST
22 मई को इस विधि से करें वटसावित्री व्रत, घर में बनी रहेगी सुख-समृद्धि

सार

धर्म ग्रंथों के अनुसार, ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री व्रत किया जाता है। इस बार ये व्रत 22 मई, शुक्रवार को है।

उज्जैन. ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, वट सावित्री का व्रत करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। ये व्रत महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं।


इस विधि से करें महिलाएं ये व्रत
- अमावस्या की सुबह वटवृक्ष (बरगद का पेड़) के नीचे महिलाएं व्रत का संकल्प इस प्रकार लें-
- परिवार की सुख-समद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए मैं ब्रह्मसावित्री व्रत कर रही हूं। मुझे इसका पूरा फल प्राप्त हो।
- इसके बाद एक टोकरी में सात प्रकार के धान्य (अलग-अलग तरह के 7 अनाज) रखकर, उसके ऊपर ब्रह्मा और ब्रह्मसावित्री तथा दूसरी टोकरी में सत्यवान व सावित्री की प्रतिमा रखकर वट वृक्ष के पास पूजा करें। साथ ही यमदेवता की भी पूजा करें।
- पूजा के बाद महिलाएं वटवृक्ष की परिक्रमा करें और जल चढ़ाएं। परिक्रमा करते समय 108 बार सूत लपेटें। परिक्रमा करते समय नमो वैवस्वताय मंत्र का जाप करें।
- नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए सावित्री को अर्घ्य दें-
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्ध्यं नमोस्तुते।।
- वटवृक्ष पर जल चढ़ाते समय यह प्रार्थना करें-
वट सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमै:।
यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोसि त्वं महीतले।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैस्च सम्पन्नं कुरु मां सदा।।
- इसके बाद अपनी सास का आशीर्वाद लें। अगर सास न हो तो परिवार की किसी अन्य बुजुर्ग महिला का आशीर्वाद लें। किसी ब्राह्मण स्त्री को सुहाग का सामान दान करें। इस दिन सावित्री-सत्यवान की कथा अवश्य सुनें।
- इसके बाद पूरे दिन उपवास करें। आवश्यकता अनुसार फलाहार ले सकते हैं। इस प्रकार जो महिलाएं व्रत व पूजा करती हैं, उनके पति की उम्र लंबी होती है।


जानिए कौन थी सावित्री, यमराज के कैसे लाई अपने पति के प्राण
- किसी समय मद्रदेश में अश्वपति नाम के राजा राज्य करते थे। उनकी कन्या का नाम सावित्री था। सावित्री जब बड़ी हुई तो उसने पिता के आज्ञानुसार पति के रूप में राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को चुना।
- राजा द्युमत्सेन का राज-पाठ जा चुका था और वे अपनी आंखों की रोशनी भी खो चुके थे। वे जंगल में रहते थे। जब यह बात नारदजी को पता चली तो उन्होंने अश्वपति को आकर बताया कि सत्यवान गुणवान तो है, लेकिन इसकी आयु अधिक नहीं है।
- यह सुनकर अश्वपति ने सावित्री को समझाया कि वह कोई और वर चुन ले, लेकिन सावित्री ने मना कर दिया। तब अश्वपति ने विधि का विधान मानकर सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया।
- सावित्री अपने पति व सास-ससुर के साथ जंगल में रहने लगी। नारदजी के कहे अनुसार सत्यवान की मृत्यु का समय निकट आ गया तो सावित्री व्रत करने लगी। नारदजी ने जो दिन सत्यवान की मृत्यु का बताया था, उस दिन सावित्री भी सत्यवान के साथ जंगल में गई।
- जंगल में लकड़ी काटते समय सत्यवान की मृत्यु हो गई और यमराज उसके प्राण हर कर जाने लगे। तब सावित्री भी उनके पीछे जाने लगी। सावित्री के पतिव्रत को देखकर यमराज ने उसे वरदान मांगने के लिए कहा।
- तब सावित्री ने अपने अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति, ससुर का खोया हुआ राज्य आदि सबकुछ मांग लिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से सत्यवान के सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान भी मांग लिया।
- वरदान देकर यमराज ने सत्यवान की आत्मा को मुक्त कर दिया और सत्यवान पुन: जीवित हो गया। इस तरह सावित्री के पतिव्रत से सत्यवान फिर से जीवित हो गया और उसका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया। वटसावित्री व्रत के दिन सभी को यह कथा अवश्य सुननी चाहिए।

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