वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार, यह तिथि सब पापों को हरने वाली और उत्तम है।
उज्जैन. मोहिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोह जाल तथा पापों से छुटकारा पा जाते हैं। इस बार यह एकादशी 3 मई, रविवार को है। पंचांग भेद के कारण कुछ स्थानों पर 4 मई, सोमवार को भी ये व्रत किया जाएगा।
ये है व्रत विधि
जो व्यक्ति मोहिनी एकादशी का व्रत करे, उसे एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि (2 मई, शनिवार) की रात से ही व्रत के नियमों का पालन करना चाहिए।
व्रत के दिन एकादशी तिथि में व्रती को सुबह सूर्योदय से पहले उठना चाहिए और स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें।
संभव हो तो किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करें और यदि यह संभव न हों तो घर में ही जल से स्नान करना चाहिए।
इस दिन भगवान श्रीविष्णु के साथ-साथ भगवान श्रीराम की पूजा भी की जाती है। व्रत का संकल्प लेने के बाद ही व्रत करें।
संकल्प इन दोनों देवों के समक्ष लें। देवों का पूजन करने के लिए कलश स्थापना कर, उसके ऊपर लाल रंग का वस्त्र बांध कर पहले कलश का पूजन करें।
इसके बाद इसके ऊपर भगवान की तस्वीर या प्रतिमा रखें। इसके बाद भगवान की प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध कर उत्तम वस्त्र पहनाएं।
फिर धूप, दीप से आरती उतारें और मीठे फलों का भोग लगाएं। इसके बाद प्रसाद वितरीत कर ब्राह्मणों को भोजन तथा दान दक्षिणा दें। रात्रि में भगवान का कीर्तन करें, सोएं नहीं।
ये है मोहिनी एकादशी व्रत की कथा
सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम का नगर था। वहां धृतिमान नाम का राजा राज्य करता था। उसी नगर में एक बनिया रहता था, उसका नाम था धनपाल।
वह भगवान विष्णु का परम भक्त था और सदा पुण्यकर्म में ही लगा रहता था। उसके पाँच पुत्र थे- सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृत तथा धृष्टबुद्धि। धृष्टबुद्धि सदा पाप कर्म में लिप्त रहता था। अन्याय के मार्ग पर चलकर वह अपने पिता का धन बरबाद किया करता था।
एक दिन उसके पिता ने तंग आकर उसे घर से निकाल दिया और वह दर-दर भटकने लगा। भटकते हुए भूख-प्यास से व्याकुल वह महर्षि कौंडिन्य के आश्रम जा पहुंचा और हाथ जोड़ कर बोला कि मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्य प्रभाव से मेरी मुक्ति हो।
तब महर्षि कौंडिन्य ने उसे वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी के बारे में बताया। मोहिनी एकादशी के महत्व को सुनकर धृष्टबुद्धि ने विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी का व्रत किया।
इस व्रत को करने से वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर बैठकर श्री विष्णुधाम को चला गया। इस प्रकार यह मोहिनी एकादशी का व्रत बहुत उत्तम है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इसके पढऩे और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।
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