चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीरामचरित मानस ग्रंथ की जयंती मनाई जाती है। इसी तिथि पर भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। इस बार ये तिथि 2 अप्रैल, गुरुवार को है।
उज्जैन. इस ग्रंथ में भगवान श्रीराम के चरित्र का वर्णन है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। ऐसी मान्यता भी है कि तुलसीदास को स्वयं भगवान श्रीराम और हनुमानजी ने दर्शन भी दिए थे। इस ग्रंथ और गोस्वामी तुलसीदास से जुड़ी कुछ रोचक बातें इस प्रकार हैं-
गोस्वामी तुलसीदासजी का जन्म संवत् 1554 में हुआ था। काशी में शेषसनातनजी के पास रहकर तुलसीदासजी ने वेद-वेदांगों का अध्ययन किया।
तुलसीदासजी ने विवाह तो किया लेकिन कुछ समय बाद ही उन्होंने घर-परिवार छोड़ दिया और संत बन गए। तीर्थाटन करते हुए तुलसीदासजी काशी आ गए।
एक रात जब तुलसीदासजी सो रहे थे तब उन्हें सपना आया। सपने में भगवान शंकर ने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषा में काव्य रचना करो। भगवान शिव की आज्ञा मानकर तुलसीदासजी अयोध्या आ गए।
संवत् 1631 को रामनवमी के दिन वैसा ही योग था जैसा त्रेतायुग में रामजन्म के समय था। उस दिन सुबह तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारंभ की।
दो वर्ष, सात महीने व छब्बीस दिन में ग्रंथ की समाप्ति हुई। संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाह के दिन इस ग्रंथ के सातों कांड पूर्ण हुए और भारतीय संस्कृति को श्रीरामचरितमानस के रूप में अमूल्य निधि प्राप्त हुई।
यह ग्रंथ लेकर तुलसीदासजी काशी गए। रात को तुलसीदासजी ने यह पुस्तक भगवान विश्वनाथ के मंदिर में रख दी। सुबह जब मंदिर के पट खुले तो उस पर लिखा था- सत्यं शिवं सुंदरम्। और नीचे भगवान शंकर के हस्ताक्षर थे।
उस समय उपस्थित लोगों ने सत्यं शिवं सुंदरम् की आवाज भी अपने कानों से सुनी। अन्य पंडितों ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में तुलसीदासजी के प्रति ईर्ष्या होने लगी।
तब पंडितों ने तुलसीदासजी का उपहास करने के उद्देश्य से भगवान काशी विश्वनाथ के मंदिर में सामने सबसे ऊपर वेद, उनके नीचे शास्त्र, शास्त्रों के नीचे पुराण और सबसे नीचे श्रीरामचरितमानस ग्रंथ रख दिया।
मंदिर बंद कर दिया गया। सुबह जब मंदिर खोला गया तो सभी ने देखा कि श्रीरामचरितमानस वेदों के ऊपर रखा हुआ है। यह देखकर पंडित लोग बहुत लज्जित हुए। उन्होंने तुलसीदासजी से क्षमा मांगी और श्रीरामचरितमानस के सर्वप्रमुख ग्रंथ माना।
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