महादेव की ही पूजा लिंग रूप में क्यों की जाती है? भगवान शिव से जुड़ी कुछ रोचक बातें

Published : Jul 30, 2019, 06:45 PM ISTUpdated : Jul 30, 2019, 07:04 PM IST
महादेव की ही पूजा लिंग रूप में क्यों की जाती है? भगवान शिव से जुड़ी कुछ रोचक बातें

सार

सावन के इस पवित्र महीने में हम आपको भगवान शिव से जुड़ी कुछ रोचक बातें बता रहे हैं जैसे- भगवान शिव के कौन से 2 अवतार अमर है और शिव का ही पूजन लिंग रूप में क्यों किया जाता है।

उज्जैन: सावन (श्रावण) में शिव भक्ति का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस महीने में भगवान शिव का विधि-विधान से पूजन आदि करने से वे प्रसन्न होकर भक्त की हर मनोकामना पूरी कर देते हैं। सावन के इस पवित्र महीने में हम आपको भगवान शिव से जुड़ी कुछ रोचक बातें बता रहे हैं जैसे- भगवान शिव के कौन से 2 अवतार अमर है और शिव का ही पूजन लिंग रूप में क्यों किया जाता है। अमर हैं भगवान शिव के दो अवतार संसार के कल्याण के लिए भगवान शिव ने भी अनेक अवतार लिए। हनुमान, दुर्वासा ऋषि, पिप्पलाद मुनि, भैरव, वीरभद्र, शरभावतार, अश्वत्थामा आदि भगवान शिव के प्रमुख अवतार हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार- अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:। कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।अर्थात- अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय ये आठों अमर हैं।

इस श्लोक के अनुसार हनुमान और अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं। हनुमानजी को अमरता का वरदान स्वयं माता सीता ने दिया था जबकि अश्वत्थामा को पृथ्वी पर रहने का श्राप भगवान श्रीकृष्ण ने दिया था।

शिव की ही पूजा लिंग रूप में क्यों ?

शिवमहापुराण के अनुसार, एकमात्र भगवान शिव ही ब्रह्मरूप होने के कारण निष्कल (निराकार) कहे गए हैं। रूपवान होने के कारण इन्हें सकल (आकार सहित) भी कहा गया है। इस प्रकार भगवान शिव ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जो निष्कल व सकल दोनों हैं। शिव के निष्कल अर्थात निराकार स्वरूप का ही पूजन लिंग रूप में किया जाता है।

इसी तरह शिव के सकल अर्थात साकार स्वरूप का पूजन मूर्ति के रूप में किया जाता है। निष्कल व सकल रूप होने से ही वे ब्रह्म शब्द से कहे जाने वाले परमात्मा हैं। यही कारण है कि एकमात्र शिव का पूजन लिंग व मूर्ति के रूप में किया जाता है। शिव से भिन्न जो दूसरे देवता हैं, वे साक्षात ब्रह्म नहीं है। इसलिए उनकी पूजा मूर्ति रूप में नहीं होती।


 

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