परंपरा: भगवान विष्णु की पूजा में क्यों चढ़ाते हैं तिल, माघ मास में क्यों मनाए जाते हैं तिल से जुड़े व्रत-पर्व?

Published : Jan 28, 2022, 06:31 PM IST
परंपरा: भगवान विष्णु की पूजा में क्यों चढ़ाते हैं तिल, माघ मास में क्यों मनाए जाते हैं तिल से जुड़े व्रत-पर्व?

सार

हिंदू पंचांग के 11वें महीने माघ में तिल से जुड़े कई व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं जैसे मकर संक्रांति, तिल चतुर्थी, षटतिला एकादशी और तिल द्वादशी (Til Dwadashi 2022)। इनके अलावा इस महीने की अमावस्या तिथि पर भी तिल दान करने का विशेष महत्व बताया गया है।

उज्जैन. माघ मास के त्योहारों पर तिल का अलग-अलग रूप से उपयोग किया जाता है। जैसे मकर संक्रांति पर तिल के लड्डू बनाकर खाए जाते हैं। तिल चतुर्थी पर भगवान श्रीगणेश को तिल से बने पकवानों का भोग लगाया जाता है। षटतिला एकादशी पर पानी में तिल डालकर स्नान किया जाता है। तिल से हवन किया जाता है और भी कई उपयोग इस दिन तिल के किए जाते हैं। इसके अगले ही दिन यानी तिल द्वादशी (इस बार 29 जनवरी, शनिवार) पर भगवान विष्णु को तिल चढ़ाया जाता है। इससे जुड़े धार्मिक और वैज्ञानिक तथ्य इस प्रकार हैं…

तिल द्वादशी पर भगवान विष्णु को क्यों चढ़ाते हैं तिल?
मत्स्यपुराण के अनुसार मधु दैत्य के वध के समय भगवान विष्णु की देह से उत्पन्न पसीने की बूंदों से तिल, कुश और उड़द की उत्पति हुई। जब मधु दैत्य मारा गया तब सभी देवता प्रसन्न होकर भगवान की स्तुति करते हुए कहने लगे- 'संसार का कल्याण करने के लिए ये तिल आपके ही शरीर से उत्पन्न हुए हैं, ये हमारी रक्षा करें।'
यह सुनकर भगवान विष्णु ने कहा- 'ये तिल तीनों लोकों की रक्षा करने वाले हैं। मेरी पूजा में इसका उपयोग करने से मोक्ष की प्राप्ति होगी।‘
इसलिए तिल को मोक्ष दायक माना जाता है और भगवान विष्णु की पूजा में तिल का उपयोग विशेष रूप से किया जाता है। गरूड़ पुराण में तिल और गंगाजल से किए गए तर्पण को मुक्तिदायक कहा गया है। साथ ही माघ माह में तिल का विशिष्ट महत्व बताया गया है। तिल काले और सफेद होते हैं, लेकिन भगवान विष्णु की पूजा में सफेद तिल का ही उपयोग किया जाता है।

माघ मास में ही क्यों आते हैं तिल से जुड़े व्रत-त्योहार?
माघ मास के दौरान शीत ऋतु अपने चरम पर होती है। इस समय शरीर को विशेष ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो तिल खाने से हमें प्राप्त होती है। जब हम तिल का उपयोग पूजा-प्रसाद आदि में करते हैं तो उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण भी करते हैं। मकर संक्रांति पर तिल के लड्डू बनाए जाते हैं। तिल चतुर्थी पर भी भगवान श्रीगणेश को तिल के पकवानों का भोग लगाया जाता है। इसी तरह तिल द्वादशी पर भी भगवान विष्णु की पूजा व प्रसाद में तिल का उपयोग किया जाता है। 

तिल का आयुर्वेदिक महत्व
आयुर्वेद के अनुसार, तिल मिले पानी से नहाने और तिल के तेल से मालिश करने से हडि्डयां मजबूत होती हैं। स्कीन में चमक आती है और मसल्स भी मजबूत होते हैं। तिल वाला पानी पीने से कई बीमारियां दूर होती हैं। तिल में एंटीऑक्सीडेंट होता है। जिससे शरीर में नई कोशिकाएं और ऊतक बनने लगते हैं। इसके साथ ही तिल में कॉपर, मैग्नीशियम, ट्राइयोफान, आयरन, मैग्नीज, कैल्शियम, फास्फोरस, जिंक, विटामिन बी 1 और रेशे बहुत ज्यादा होते हैं। ये सारी चीजें जोड़ों के दर्द दूर करती हैं और रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने में मदद करती हैं।


 

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