हिंदू धर्म से जुड़ी अनेक परंपराएं हैं जिनके पीछे वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक तथ्य भी छिपे हैं।
उज्जैन. ऐसी ही एक परंपरा है ये भी है कि कोई भी शुभ काम करते समय काले कपड़े नहीं पहनने चाहिए। विशेषकर विवाह के दौरान तो दूल्हा और दुल्हन के काले कपड़े पहनने पर पूरी तरह से पाबंदी होती है। कुछ लोग इसे अपशकुन मानते हैं। इस परंपरा के पीछे न सिर्फ धार्मिक बल्कि मनोवैज्ञानिक तथ्य भी छिपा है, जो इस प्रकार है...
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो काले रंग को निराशा का प्रतीक माना गया है, जबकि लाल रंग को सौभाग्य का।
इसलिए शादी आदि शुभ कामों में लाल, पीले और गुलाबी रंगों को अधिक मान्यता दी जाती है।
वैज्ञानिक तथ्य भी है कि लाल रंग ऊर्जा का स्तोत्र है। साथ ही, लाल रंग पॉजिटिव एनर्जी का भी प्रतीक है।
इसके विपरीत जब नीले, भूरे और काले रंगों की मनाही करते हैं तो उसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण हैं।
काला रंग नैराश्य का प्रतीक है। ऐसी भावनाओं को शुभ कामों में नहीं आने देना चाहिए।
पहले ही कोई नकारात्मक विचार मन में जन्म ले लेंगे तो रिश्ते का आधार मजबूत नहीं हो सकता। इसलिए शादी में वर और वधू दोनों को ही काले कपड़े नहीं पहनना चाहिए।
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