
यह उन रातों की कहानी है, जिन्हें भारत के आर्थिक इतिहास में हमेशा एक दर्दनाक सबक की तरह याद किया जाएगा। आज से 35 साल पहले, मई 1991 की बात है। मुंबई की सड़कों पर सुबह होने से पहले कुछ ट्रक गुपचुप तरीके से एयरपोर्ट की तरफ बढ़ रहे थे। उन ट्रकों में कोई मामूली सामान नहीं, बल्कि भारत का स्वाभिमान लदा हुआ था। वो रिज़र्व बैंक का 67 टन सोना था! खाड़ी युद्ध की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी और उसे बचाने के लिए यह सोना लंदन और स्विट्जरलैंड में गिरवी रखने के लिए ले जाया जा रहा था।
लेकिन आज, जब 2026 में खाड़ी में फिर से युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं, तो भारत घबरा नहीं रहा है। तब हमारे पास सिर्फ 1.2 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा थी, आज हमारा खजाना 700 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का है।
भारत के बुरे दिन 1990 में तब शुरू हुए जब इराक ने कुवैत पर हमला कर दिया। कच्चे तेल की कीमत 17 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर सीधे 46 डॉलर पर पहुंच गई। खाड़ी देशों से आने वाला पैसा बंद हो गया और लाखों प्रवासी भारतीय वापस देश लौट आए। देश एक बड़े आर्थिक संकट में फंस गया था। हमारे पास विदेशों से सामान आयात करने के लिए सिर्फ तीन हफ़्तों का पैसा (1.2 अरब डॉलर) बचा था।
उस समय की चंद्रशेखर सरकार ने 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और 20 टन सोना यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड में हवाई जहाज से भेजा। इससे हमें 600 मिलियन डॉलर मिले, जिसने उस वक्त भारत को दिवालिया होने से बचा लिया। इसी संकट ने बाद में नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकार को बड़े आर्थिक सुधार करने पर मजबूर किया, जिससे देश में 'लाइसेंस राज' खत्म हुआ और भारतीय बाज़ार दुनिया के लिए खुल गए।
35 साल बाद, खाड़ी में फिर से तनाव बढ़ गया है। ईरान पर हमले और होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावटों के कारण कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के पार चली गई है। रुपये की कीमत भी गिरकर एक डॉलर के मुकाबले 95.21 पर आ गई है। लेकिन, आज भारत 1991 वाली स्थिति में बिल्कुल नहीं है।
1991 में जो भंडार सिर्फ 1.2 अरब डॉलर का था, वो अप्रैल 2026 तक 700.95 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। इसका मतलब है कि अगर दुनिया में कोई भी आर्थिक संकट आए, तो भी भारत अगले 11 महीनों तक आराम से अपना आयात बिल चुका सकता है।
उस समय भारत के पास तेल जमा करने के लिए अपने कोई खास इंतज़ाम नहीं थे। आज विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पाडुर में ज़मीन के नीचे बने विशाल टैंकों में हमने 5.33 मिलियन मीट्रिक टन तेल जमा कर रखा है। इसके अलावा, तेल कंपनियों के पास भी 64 दिनों का स्टॉक मौजूद है।
निर्यात से होने वाली कमाई और विदेश में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजा गया पैसा (129 अरब डॉलर) आज भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। साथ ही, अब हम सिर्फ खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि रूस समेत करीब 40 देशों से तेल खरीद रहे हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि कोई चुनौती नहीं है। तेल की कीमतें बढ़ने पर सरकार को खाद सब्सिडी पर भारी रकम (1.71 लाख करोड़ रुपये) खर्च करनी पड़ रही है। लेकिन एक बात तय है, 1991 की तरह 'मजबूरी में' सोना गिरवी रखने की नौबत अब भारत पर नहीं आएगी। देश अब पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों पर तेज़ी से काम कर रहा है। 1991 के उन काले दिनों ने हमें आत्मनिर्भरता का जो पाठ पढ़ाया था, वही आज भारत का सबसे बड़ा आत्मविश्वास बन गया है।
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