
Train Waiting Ticket Confirm Kab Hota Hai: गर्मियों की छुट्टियां (Summer Vacations) चल रही हैं। कोई बच्चों को लेकर गांव जा रहा है, तो कोई ठंडी वादियों में घूमने का प्लान बना रहा है। ऐसे में ट्रेन में टिकट मिलना सबसे बड़ा टास्क बन गया है। बुकिंग के बाद जब टिकट वेटिंग में जाता है, तो हर किसी के मन में एक ही टेंशन चलती रहती है, 'वेटिंग टिकट कंफर्म होगा या नहीं?' अगर आप भी इसी कशमकश में फंसे हैं, तो बता दें कि रेलवे का टिकट कंफर्म होना कोई आसान काम नहीं है। इसके पीछे एक पूरा सिस्टम काम करता है, जिससे तय होता है कि आपकी वेटिंग क्लियर होगी या आप घर पर ही छुट्टियां मनाएंगे।
GNWL (General Waiting List)
यह सबसे आम और सबसे बेस्ट वेटिंग लिस्ट है। जब आप ट्रेन के शुरू होने वाले स्टेशन (Originating Station) या उसके आस-पास के स्टेशन से टिकट बुक करते हैं, तो GNWL मिलता है। इसके कंफर्म होने का चांस सबसे ज्यादा (High) होता है। रेलवे सबसे पहले इसी लिस्ट को क्लियर करता है।
RLWL (Remote Location Waiting List)
जब आप ट्रेन के शुरुआती और आखिरी स्टेशन के बीच पड़ने वाले किसी बड़े स्टेशन (इंटरमीडिएट स्टेशन) के लिए टिकट बुक करते हैं, तो यह कोड मिलता है। इन स्टेशनों के लिए रेलवे का एक अलग छोटा कोटा होता है। इसके कंफर्म होने का चांस कम होता है।
PQWL (Pooled Quota Waiting List)
यह तब मिलता है जब आप दो छोटे स्टेशनों के बीच का टिकट बुक करते हैं, जो ट्रेन के रूट के बीच में आते हैं। पूरी ट्रेन में इसके लिए बहुत कम सीटें रिज़र्व होती हैं। इसके कंफर्म होने का चांस सबसे कम (Low) होता है।
कैंसिलेशन का ट्रेंड (Cancellation Trend)
वेटिंग टिकट कंफर्म कब और कैसे होता है, इसका सीधा सा सिस्टम है कि जब कोई अपनी कंफर्म सीट कैंसल कराएगा, तभी वेटिंग वाले को सीट मिलेगी। लेकिन रेलवे का सिस्टम सिर्फ इतने पर ही नहीं चलता। इसके पीछे 3 बड़े फैक्टर्स काम करते हैं। जिसमें से पहला कैंसिलेशन का ट्रेंड है। गर्मियों में लोग बैकअप के लिए 2-3 ट्रेनों में टिकट बुक कर लेते हैं। जैसे-जैसे सफर तारीख नजदीक आती है, लोग फालतू टिकट कैंसल करते हैं। चार्ट बनने के 24 घंटे पहले सबसे ज्यादा कैंसिलेशन होते हैं, जिससे वेटिंग तेजी से गिरती है।
अनयूज्ड कोटा (Unused Quota)
रेलवे में VIP, सीनियर सिटीजन, वीमेन और दिव्यांगों के लिए अलग-अलग कोटे (Quotas) होते हैं। अगर ट्रेन छूटने के कुछ घंटे पहले तक इन कोटों की सीटें खाली रह जाती हैं, तो रेलवे इन्हें जनरल वेटिंग लिस्ट (GNWL) वालों को ट्रांसफर कर देता है।
चार्ट बनने का टाइम (Chart Preparation)
ट्रेन खुलने से ठीक 9-10 घंटे पहले पहला रिजर्वेशन चार्ट बनता है। इसी वक्त सबसे ज्यादा वेटिंग टिकट कंफर्म होते हैं। अगर इसके बाद भी आपकी वेटिंग रह जाती है, तो ट्रेन छूटने के 30 मिनट पहले दूसरा चार्ट बनता है, जिसमें आखिरी बची-खुची सीटें बांटी जाती हैं।
ट्रेन टिकट कितनी वेटिंग तक कंफर्म हो सकता है, इसका सिस्टम स्लीपर क्लास (Sleeper) और एसी (AC) थोड़ा अलग होता है। AC क्लास (2A, 3AC) में वेटिंग 1 से 20 के बीच हो, तो सेफ और 40 से ऊपर हो, तो रिस्क जोन में माना जाता है। स्लीपर क्लास में वेटिंग वेटिंग 1 से 50 के बीच हो, तो सेफ माना जाता है और 100 से ऊपर हो, तो भगवान भरोसे होता है। यह नियम त्योहारों और गर्मियों की छुट्टियों (Peak Season) में बदल सकता है, क्योंकि इस समय लोग कंफर्म टिकट बहुत कम कैंसल कराते हैं।
Vikalp स्कीम
अगर आपकी वेटिंग लंबी है, तो IRCTC के इस फीचर का इस्तेमाल कर सकते हैं। टिकट बुक करते समय 'VIKALP' ऑप्शन पर टिक ज़रूर करें। अगर आपकी ट्रेन में सीट कंफर्म नहीं हुई, तो रेलवे आपको उसी रूट की दूसरी ट्रेन में खाली सीट दे देगा, जिसमें कोई एक्स्ट्रा चार्ज भी नहीं लगेगा।
ऑटो-अपग्रेडेशन (Auto-Upgradation)
हमेशा टिकट बुक करते समय 'Consider for Auto-Upgradation' पर क्लिक करें। कई बार स्लीपर क्लास के वेटिंग वालों को खाली रहने पर सीधे थर्ड एसी (3AC) में सीट मिल जाती है।
करंट बुकिंग (Current Booking)
ट्रेन का पहला चार्ट बनने के बाद IRCTC ऐप पर 'करंट बुकिंग' ओपन होती है। अगर ट्रेन में कोई भी सीट खाली बची है, तो वह सीधे बहुत ही सस्ते दाम पर वहां मिल जाती है।
RAC (Reservation Against Cancellation)
अगर आपका टिकट RAC में आ गया है, तो आपको ट्रेन में चढ़ने की परमिशन है। इसमें आपको पूरी बर्थ (सोने की सीट) नहीं मिलती, बल्कि एक सीट पर दो लोग बैठकर यात्रा करते हैं। TTE के पास सीट खाली होने पर इसे फुल बर्थ बना दिया जाता है।
तत्काल वेटिंग लिस्ट (TQWL)
तत्काल में वेटिंग टिकट लेना सबसे बड़ा घाटे का सौदा माना जाता है। तत्काल की वेटिंग लिस्ट बहुत मुश्किल से क्लियर होती है, क्योंकि रेलवे पहले जनरल वेटिंग क्लियर करता है, तत्काल नहीं। ऐसे में पैसेंजर्स को परेशान होना पड़ सकता है।
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