
Wing Commander: भारतीय वायुसेना के एक विंग कमांडर को सैन्य जानकारी शेयर करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। 30 मई को पुलिस ने उसे अरेस्ट कर जांच की और फिर 30 जुलाई को कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। पुलिस के मुताबिक, सोशल मीडिया के जरिए एक पाकिस्तानी महिला ने अधिकारी से संपर्क किया। इसके बाद वीडियो कॉल और दूसरे डिजिटल माध्यमों से संपर्क बढ़ा। पुलिस ने मामले में हनीट्रैप का आरोप लगाया है। अधिकारी के खिलाफ ऑफिशियल सेक्रेट्स एक्ट (Official Secrets Act) के तहत मामला दर्ज किया गया था। ऐसे में आइए जानते हैं आखिर विंग कमांडर कौन होता है? वायुसेना में यह कितनी बड़ी पोस्ट है? विंग कमांडर बनने के लिए क्या करना पड़ता है? कितनी पढ़ाई करनी होती है और इस पद पर पहुंचने के बाद कितनी सैलरी मिलती है?
विंग कमांडर भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) की एक टॉप कमीशंड ऑफिसर रैंक है। यह ऐसा अधिकारी होता है, जिसके पास अपनी यूनिट, टीम और ऑपरेशन से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारियां हो सकती हैं। IAF की रैंक में विंग कमांडर स्क्वाड्रन लीडर से ऊपर और ग्रुप कैप्टन से नीचे होता है। यानी रैंक का क्रम समझें तो फ्लाइंग ऑफिसर, फ्लाइट लेफ्टिनेंट, स्क्वाड्रन लीडर, विंग कमांडर और ग्रुप कैप्टन होता है। इस पोस्ट तक पहुंचने वाले अधिकारी के पास आमतौर पर कई साल का सर्विस एक्सपीरिएंस होता है और उसे टीम लीड करने से लेकर ऑपरेशन और प्लानिंग तक कई जिम्मेदारियां संभालनी पड़ सकती हैं।
विंग कमांडर को IAF की मिड-लेवल सीनियर ऑफिसर रैंक माना जा सकता है। इस पद पर अधिकारी को उसकी पोस्टिंग और जिम्मेदारी के हिसाब से अलग-अलग काम मिल सकते हैं। कुछ विंग कमांडर फ्लाइंग यूनिट में काम कर सकते हैं, जबकि कुछ टेक्निकल, ट्रेनिंग, एडमिनिस्ट्रेशन या दूसरे विभागों में जिम्मेदारी संभालते हैं। यानी हर विंग कमांडर का काम एक जैसा नहीं होता है। किसी की जिम्मेदारी ऑपरेशनल स्क्वाड्रन से जुड़ी हो सकती है तो कोई टेक्निकल या स्टाफ रोल में काम कर सकता है।
अगर कोई विंग कमांडर किसी ऑपरेशनल यूनिट की कमान संभाल रहा है तो उसकी जिम्मेदारी काफी बड़ी हो सकती है। उसे मिशन की तैयारी, टीम मैनेजमेंट, ट्रेनिंग और ऑपरेशनल रेडीनेस जैसे काम देखने पड़ सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह पूरी एयरफोर्स या किसी बड़े एयर बेस का अकेले फैसला करता है। बड़े फैसले तय कमांड चैन के जरिए ऊपर जाते हैं और अलग-अलग स्तर के अधिकारियों की मंजूरी जरूरी होती है। यानी विंग कमांडर के पास जिम्मेदारी और अधिकार होते हैं, लेकिन वे एक तय सिस्टम के अंदर काम करते हैं।
विंग कमांडर का काम उसकी ब्रांच और पोस्टिंग पर निर्भर करता है। फिर भी कुछ आम जिम्मेदारियां इस तरह हो सकती हैं...
नहीं। विंग कमांडर एक रैंक है, जबकि अधिकारी किस ब्रांच में काम करता है, यह अलग बात है। एयरफोर्स में फ्लाइंग के अलावा टेक्निकल, एडमिनिस्ट्रेशन और दूसरी विशेषज्ञता वाली भूमिकाएं भी होती हैं।
7वें केंद्रीय वेतन आयोग के पे-मैट्रिक्स (Pay Matrix) के मुताबिक विंग कमांडर की रैंक लेवल 12 ए (Level 12A) में आती है। इस लेवल पर बेसिक पे करीब ₹1,21,200 मंथली से शुरू होता है। इसके अलावा अधिकारी को उसकी पात्रता और पोस्टिंग के हिसाब से अलग-अलग भत्ते मिल सकते हैं।
इन-हैंड सैलरी यानी खाते में आने वाली रकम हर अधिकारी के लिए एक जैसी नहीं होती है। इस पर पोस्टिंग, भत्ते, टैक्स, NPS और दूसरी कटौतियों का असर पड़ता है। सैलरी स्ट्रक्चर के आधार पर एक अनुमानित इन-हैंड सैलरी करीब ₹1.40 लाख से ₹1.80 लाख मंथली के आसपास हो सकती है। हालांकि, रियल इन हैंड सैलरी अधिकारी की परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकती है। इसी तरह कुल ग्रॉस पैकेज भी भत्तों के हिसाब से बदलता रहता है।
नहीं। कोई भी सीधे विंग कमांडर बनकर एयरफोर्स में एंट्री नहीं लेता है। पहले उसे भारतीय वायुसेना में एक कमीशंड ऑफिसर के तौर पर शामिल होना होता है। इसके बाद सर्विस, परफॉर्मेंस, ट्रेनिंग और प्रमोशन की प्रक्रिया से गुजरते हुए वह आगे की रैंक हासिल करता है।
NDA
12वीं के बाद कैंडिडेट्स NDA (National Defence Academy) के रास्ते डिफेंस सर्विस में ऑफिसर बनने की तैयारी कर सकते हैं। इसके लिए तय एजुकेशनल क्वॉलिफिकेशन और एज रिलेटेड शर्तें पूरी करनी होती हैं।
CDS
ग्रेजुएशन के बाद CDS (Combined Defence Services) के जरिए भी IAF में ऑफिसर एंट्री का रास्ता हो सकता है। यहां भी संबंधित भर्ती नोटिफिकेशन में दी गई एलिजिबिलिटी देखना जरूरी है।
AFCAT
AFCAT (Air Force Common Admission Test) भारतीय वायुसेना में ऑफिसर एंट्री का एक तरीका ये भी है। फ्लाइंग और ग्राउंड ड्यूटी की अलग-अलग ब्रांचेस के लिए भर्ती प्रक्रिया होती है।
NCC स्पेशल एंट्री
योग्य NCC उम्मीदवारों के लिए भी विशेष एंट्री का रास्ता मौजूद हो सकता है। इसके अलावा टेक्निकल योग्यता वाले उम्मीदवारों के लिए भी संबंधित एंट्री स्कीम होती हैं।
उपलब्ध सर्विस प्रोग्रेशन के अनुसार विंग कमांडर तक पहुंचने में करीब 13 साल की कमीशंड सर्विस का समय लग सकता है, लेकिन प्रमोशन सिर्फ समय पूरा होने से तय नहीं होता है। इसमें अधिकारी का प्रदर्शन, मेडिकल फिटनेस, ट्रेनिंग, कोर्स, सेलेक्शन प्रॉसेस, उपलब्ध वैकेंसी और सर्विस रिकॉर्ड जैसी चीजें भी मायने रखती हैं। इसलिए इसे एक फिक्स टाइमलाइन की तरह नहीं समझना चाहिए।
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