
Nana Patekar Indian Army: दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं हैं। 75 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। उन्हें गोवा स्थित आवास पर गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया था। हिंदी और मराठी सिनेमा में अपनी दमदार अदाकारी के लिए पहचाने जाने वाले नाना की जिंदगी का एक ऐसा पहलू भी था, जिसे जानकर उनके प्रति सम्मान और बढ़ जाता है। वह सिर्फ पर्दे पर ही देशभक्ति का किरदार निभाने वाले अभिनेता नहीं थे, बल्कि 1999 के करगिल युद्ध के दौरान उन्होंने सेना के जवानों के साथ करीब दो महीने बिताए थे।
साल 2024 में ‘द लल्लनटॉप’ को दिए एक इंटरव्यू में नाना पाटेकर ने करगिल युद्ध से जुड़ा यह किस्सा साझा किया था। उन्होंने बताया था कि युद्ध के दौरान वह तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से मिले और सेना के साथ जाने की इच्छा जताई।
शुरुआत में उन्हें मना कर दिया गया। वजह साफ थी—एक आम नागरिक को सीधे युद्ध क्षेत्र में सेना के साथ नहीं भेजा जा सकता था। लेकिन नाना अपनी बात पर कायम रहे। उन्होंने बताया कि वह कमांडो प्रशिक्षण ले चुके थे और हथियार चलाने के साथ राइफल शूटिंग का भी अनुभव रखते थे। राष्ट्रीय स्तर की शूटिंग प्रतियोगिताओं में भी वह हिस्सा ले चुके थे।
आखिरकार नाना पाटेकर को सेना के साथ जाने की अनुमति मिल गई। इसके बाद उन्होंने करीब 60 दिन जवानों के साथ बिताए। इस दौरान वह द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामूला और सोपोर जैसे इलाकों में गए।
#NanaPatekar was not just a hero on the big screen, but a hero for the nation too.
He stood alongside our soldiers during the 1999 Kargil War and showed that his love for the country went far beyond his films.
Losing a man like him is truly heartbreaking.
You will be deeply missed, Nana Patekar sir. 🇮🇳🙏
— Amit Kumar Sindhi (@AMIT_GUJJU) October 8, 2026
नाना ने बताया था कि बाद में वह क्विक रिएक्शन टीम यानी QRT का हिस्सा भी बने। हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि वहां उनकी असल जिम्मेदारी क्या थी, तो उन्होंने इस बारे में विस्तार से बताने से इनकार कर दिया। उनका बस इतना कहना था—‘मुझसे अभी मत पूछो।’
करगिल में बिताए उन दो महीनों का असर नाना के शरीर पर भी पड़ा। उन्होंने अपने इंटरव्यू में बताया था कि जब वह वहां गए थे, तब उनका वजन करीब 76 किलो था, लेकिन लौटने तक यह घटकर 56 किलो रह गया था।
यानी महज दो महीनों में उनका वजन करीब 20 किलो कम हो गया था। उन्होंने उस दौर को बेहद कठिन बताया, लेकिन इसके बावजूद उनके लिए सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्हें देश के जवानों के साथ खड़े होने और अपनी तरफ से योगदान देने का मौका मिला।
नाना पाटेकर ने इस अनुभव को कभी अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश नहीं किया। वह इसे देश और जवानों के प्रति अपने सम्मान से जोड़कर देखते थे। उन्होंने कहा था कि उन्हें खुशी थी कि वह देश के लिए कम से कम इतना योगदान दे सके।
यही वजह है कि नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ एक शानदार अभिनेता के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी बात पर अडिग रहने वाले और सैनिकों के प्रति गहरा सम्मान रखने वाले शख्स के रूप में भी होती है। उनके निधन के बाद करगिल से जुड़ा यह किस्सा उनकी जिंदगी के उन अनदेखे अध्यायों में से एक है, जिसे लोग लंबे समय तक याद रखेंगे।
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