28 मार्च को इस विधि से करें होलिका पूजन, जानिए शुभ मुहूर्त, कथा और इससे जुड़ा लाइफ मैनेजमेंट

Published : Mar 27, 2021, 12:20 PM ISTUpdated : Mar 27, 2021, 12:24 PM IST

उज्जैन. धर्म ग्रंथों के अनुसार, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। इसे बार ये तिथि 28 मार्च, रविवार को है। दहन के पूर्व महिलाएं होलिका की पूजा करती हैं। मान्यता है कि होली की पूजा करने से पुण्य मिलता है और घर में सुख-शांति के साथ धन-धान्य की भी कमी नहीं होती। होली की पूजन विधि इस प्रकार है-

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28 मार्च को इस विधि से करें होलिका पूजन, जानिए शुभ मुहूर्त, कथा और इससे जुड़ा लाइफ मैनेजमेंट

आवश्यक सामग्री
रोली, कच्चा सूत, चावल, फूल, साबूत हल्दी, मूंग, बताशे, नारियल, बड़कुले (छोटे-छोटे उपलों की माला) आदि।
 

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इस विधि से करें होलिका पूजन
एक थाली में पूजा की सारी सामग्री लें और साथ में एक पानी से भरा लोटा भी लें। इसके बाद होली पूजन के स्थान पर पहुंचकर नीचे लिखे मंत्र को बोलते हुए स्वयं पर और पूजन सामग्री पर थोड़ा जल छिड़कें-

ऊं पुण्डरीकाक्ष: पुनातु,
ऊं पुण्डरीकाक्ष: पुनातु,
ऊं पुण्डरीकाक्ष: पुनातु।

अब हाथ में पानी, चावल, फूल एवं कुछ दक्षिणा लेकर नीचे लिखा मंत्र बोलें-

ऊं विष्णु: विष्णु: विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया अद्य दिवसे प्रमादी नाम संवत्सरे संवत् 2077 फाल्गुन मासे शुभे शुक्लपक्षे पूर्णिमायां शुभ तिथि रविवासरे--गौत्र (अपने गौत्र का नाम लें) उत्पन्ना--(अपना नाम बोलें) मम इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सर्वपापक्षयपूर्वक दीर्घायुविपुलधनधान्यं शत्रुपराजय मम् दैहिक दैविक भौतिक त्रिविध ताप निवृत्यर्थं सदभीष्टसिद्धयर्थे प्रह्लादनृसिंहहोली इत्यादीनां पूजनमहं करिष्यामि।
 

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गणेश-अंबिका पूजन
हाथ में फूल व चावल लेकर भगवान गणेश का ध्यान करें-
ऊं गं गणपतये नम: आह्वानार्र्थे पंचोपचार गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।।

अब भगवान गणपति को एक फूल पर रोली एवं चावल लगाकर समर्पित कर दें।
ऊं अम्बिकायै नम: आह्वानार्र्थे पंचोपचार गंधाक्षतपुष्पाणि सर्मपयामि।।

मां अंबिका का ध्यान करते हुए पंचोपचार पूजा के लिए गंध, चावल एवं फूल चढ़ाएं।
ऊं नृसिंहाय नम: आह्वानार्थे पंचोपचार गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।।

भगवान नृसिंह का ध्यान करते हुए पंचोपचार पूजा के लिए गंध, चावल व फूल चढ़ाएं।
ऊं प्रह्लादाय नम: आह्वानार्थे पंचोपचार गंधाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।।

प्रह्लाद का स्मरण करते हुए नमस्कार करें और गंध, चावल व फूल चढ़ाएं।

अब नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए होली के सामने दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो जाएं तथा अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए निवेदन करें-
असृक्पाभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै: अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव:।।

अब गंध, चावल, फूल, साबूत मूंग, साबूत हल्दी, नारियल एवं बड़कुले (भरभोलिए) होली के समीप छोड़ें। कच्चा सूत उस पर बांधें और फिर हाथ जोड़ते हुए होली की तीन, पांच या सात परिक्रमा करें। परिक्रमा के बाद लोटे में भरा पानी वहीं चढ़ा दें।
 

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ये हैं होली पूजा के शुभ मुहूर्त
पूर्णिमा तिथि 28 मार्च को सुबह करीब 03:30 बजे से प्रारंभ होगी, जो 29 मार्च की रात करीब 12.15 बजे तक रहेगी। 28 मार्च की सुबह भद्रा रहेगी, लेकिन दोपहर में ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए होलिका पूजन पर भद्रा का कोई असर नहीं होगा। होलिका पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 6:21 बजे से रात 8:41 बजे तक है।
 

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होली से जुड़ी धार्मिक कथा
प्राचीन काल में हिरण्यकश्यपु नाम का एक असुर था। वह भगवान विष्णु को अपना शत्रु समझता था। हिरण्यकश्यपु का पुत्र प्रह्लाद विष्णु जी का परम उपासक था। हिरण्यकश्यपु अपने बेटे के द्वारा भगवान विष्णु की आराधना करने पर बेहद नाराज रहता था, ऐसे में उसने उसे मारने का फैसला लिया। हिरण्यकश्यपु ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ जाएं, क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि से नहीं जलेगी। जब होलिका ने ऐसा किया तो प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ और होलिका जलकर राख हो गई।

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होलिका पर इसलिए चढ़ाते हैं पूजन सामग्री
फाल्गुन पूर्णिमा की शाम को महिलाएं होली की पूजा करती हैं तथा विभिन्न पूजन सामग्री होली को अर्पित करती हैं, जैसे- उंबी, गोबर से बने बड़कुले, नारियल व नाड़ा आदि। परंपरागत रूप से होली पर चढ़ाई जाने वाली सामग्री के पीछे भी कुछ भाव छिपे हैं, जो इस प्रकार हैं-

उंबी
यह नए धान्य का प्रतीक है। इस समय गेहूं की फसल कटती है। ईश्वर को धन्यवाद देने के उद्देश्य से होली में उंबी समर्पित की जाती है। इसलिए अग्नि को भोग लगाते हैं और प्रसाद के रूप में अन्न उपयोग में लेते हैं।

गोबर के बड़कुले की माला
अग्नि और इंद्र वसंत की पूर्णिमा के देवता माने गए हैं। ये अग्नि को गहने पहनाने के प्रतीक रूप में चढ़ाए जाते हैं। इन्हें 10 दिन पहले बालिकाएं बनाती हैं।

नारियल व नाड़ा
नारियल को धर्म ग्रंथों में श्रीफल कहा गया है। फल के रूप में इसे अर्पण करते हैं। इसे चढ़ाकर वापस लाते हैं और प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं। वहीं नाड़े को वस्त्र का प्रतीक माना गया है। होलिका को श्रृंगारित करने का भाव इसमें निहित है।

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