उज्जैन. आज (9 मई) मदर्स डे है। हिंदू धर्म ग्रंथों में माता को भगवान से भी अधिक पूजनीय बताया गया है। हमारे ग्रंथों में कई ऐसी माताओं के बारे में बताया गया है, जिनकी संतान को समाज में एक आदर्श के रूप में देखा जाता है। इनमें से कई माताएं तो ऐसी भी हैं, जिन्होंने अभावों में रहकर भी अपनी संतान को गुणी और चरित्रवान बनाया। इनकी संतान की सफलता का श्रेय उनकी माताओं को ही जाता है। आज हम आपको धर्म ग्रंथों में बताई गई ऐसी ही माताओं के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार है… हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है। इस बार यह 9 मई को मनाया जा रहा है। मदर्स डे का दिन माताओं के लिए समर्पित होता है। वैसे तो मां की ममता और प्यार किसी दिन की मोहताज नहीं। लेकिन मां के संघर्ष और ममता को सम्मान देने के लिए आज का दिन यानी मदर्स डे बनाया गया है।
1. कौशल्या
भगवान श्रीराम की माता कौशल्या रामायण की एक प्रमुख पात्र हैं। ग्रंथों के अनुसार वे कौशल प्रदेश (छत्तीसगढ़) की राजकुमारी थीं। गुणभद्रकृत 'उत्तर-पुराण' में कौशल्या की माता का नाम सुबाला दिया गया है। कुछ ग्रंथों में देवमाता अदिति के कौशल्या के रूप में अवतार लेने का वर्णन भी मिलता है। आनन्द-रामायण में दशरथ एवं कौशल्या के विवाह का वर्णन विस्तार से हुआ है।
आदर्श मां का उदाहरण हैं कौशल्या
श्रीरामचरित मानस के अनुसार जब श्रीराम वनवास जाने के बात माता कौशल्या को बताते हैं व वन जाने की आज्ञा मांगते हैं तो कौशल्या पहले तो बहुत दुखी होती हैं और बाद में अर्ध-अधर्म पर विचार कर सोचती हैं कि यदि मैं हठ करके पुत्र (श्रीराम) को रोक लूं तो धर्म जाता है और भाइयों में विरोध होता है और यदि जाने को कहती हूं तो बड़ी हानि होती है। फिर कौशल्या पतिव्रत धर्म को समझकर रात तथा भरत दोनों पुत्रों को समान जानकर कहती हैं-
सरल सौभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।।
तात जाऊं बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।।
अर्थात- सरल स्वभाव वाली श्रीरामचंद्रजी की माता बड़ा धीरज धरकर बोलीं- हे तात। मैं बलिहारी जाती हूं, तुमने अच्छा किया। पिता की आज्ञा का पालन करना ही सब धर्मों का शिरोमणि धर्म है।
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2. सीता
सीता मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पत्नी व लव-कुश की माता थीं। ग्रंथों में इन्हें साक्षात देवी लक्ष्मी का अवतार बताया गया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार जब राजा जनक यज्ञ की भूमि तैयार करने के लिए हल से भूमि जोत रहे थे, उसी समय उन्हें भूमि से एक कन्या प्राप्त हुई। जोती हुई भूमि को तथा हल की नोक को सीता कहते हैं। इसलिए उस बालिका का नाम सीता रखा गया।
श्रीराम की ही तरह मर्यादा का पालन करने वाली थीं सीता
सीता ने हर रूप में मर्यादा का पालन किया चाहे वो बहू के रूप में हो, पत्नी के रूप में या माता के रूप में। जब श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास दिया गया तब पत्नी धर्म का पालन करते हुए सीता भी श्रीराम के साथ वन में चली गईं। उन्होंने श्रीराम को वनवास दिए जाने का विरोध तक नहीं किया। वन में रहते हुए हर प्रकार के अपने पति की सेवा की। माता के रूप में लव-कुश को श्रेष्ठ शिक्षा प्रदान की। अंत में अपनी पवित्रता की शपथ लेते हुए धरती में समा गईं।
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3. कुंती
कुंती का मूल नाम पृथा था। ये महाराज शूरसेन की बेटी और वसुदेव की बहन थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुंतीभोज की कोई संतान नहीं थी। तब राजा शूरसेन ने पृथा को कुंतीभोज को पुत्री के रूप में गोद दे दिया। इससे उनका नाम 'कुंती' पड़ गया। कुंती का विवाह चंद्रवंशी राजा पांडु से हुआ था।
अभाव में दी पुत्रों को श्रेष्ठ शिक्षा
युधिष्ठिर, भीम व अर्जुन कुंती के पुत्र थे, जबकि नकुल व सहदेव राजा पांडु की एक अन्य पत्नी माद्री की संतान थे। इसके बाद भी कुंती ने कभी भी माद्री के पुत्रों को अपने पुत्रों से कम नहीं समझा और न ही कभी उनके साथ भेदभाव किया। कुंती ने नकुल व सहदेव को भी वैसा ही स्नेह दिया जैसा उन्होंने अपने पुत्रों को दिया। राजा पांडु की मृत्यु के बाद हस्तिनापुर में रहते हुए अभावों के बीच भी कुंती ने अपने पुत्रों को श्रेष्ठ शिक्षा दी व धर्म पथ पर चलते रहने के लिए प्रेरित किया। जब युद्ध की बात आई तो कुंती ने अपने पुत्रों से धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने के लिए प्रेरित किया न कि सत्ता के लालच में। अंत समय में कुंती ने धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा कर अपने धर्म का निर्वाह किया।
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4. अनुसूया
हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णित पतिव्रत महिलाओं में माता अनूसूया का स्थान बहुत ऊंचा है। परम पिता ब्रह्मा के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि को इन्होंने पति के रूप में प्राप्त किया था। वनवास काल में जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी।
त्रिदेवों की माता थीं अनुसूया
धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पातिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया। भगवान ने इनका अंहकार नष्ट करने के लिए लीला रची। तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधुवेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूया से भिक्षा मांगी मगर यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी। देवी अनुसूया ने अपने पति का स्मरण किया और बोला कि यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छ:-छ: मास के शिशु हो जाएं। और तुरंत तीनों देव शिशु होकर रोने लगे। तब अनुसूया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया और पालने में झूलाने लगीं। तब तीनों देवियां अनुसूया के पास आईं और क्षमा मांगी। प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।
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6. देवहूति
माता देवहूति स्वायम्भुव मनु की पुत्री थीं। इनका विवाह महायोगी कर्दम से हुआ था। भगवान विष्णु के पांचवे अवतार कपिल मुनि इन्हीं के पुत्र थे। कपिल मुनि ने सबसे पहले अपनी माता देवहूति को ही सांख्य दर्शन का उपदेश दिया था।
पुत्र से पाया ज्ञान
देवहूति की विवाह जब महर्षि कर्दम से हुआ तब उन्होंने कहा कि केवल संतान उत्पन्न होने तक ही वे गृहस्थ धर्म का पालन करेंगे, इसके बाद पुनः संन्यास आश्रम में चले जाएंगे। विवाह के बाद देवहूति को नौ कन्याएं हुई, इसके बाद भगवान विष्णु ने कपिल मुनि के रूप में अवतार लिया। कर्दम जब संन्यास लेकर वन जाने लगे तो देवहूती ने कहा, "स्वामी मेरा क्या होगा?" इस पर ऋषि कर्दम ने कहा कि "तेरा पुत्र ही तुझे ज्ञान देगा।" समय आने पर कपिल ने माता को जो ज्ञान दिया, वही 'सांख्य दर्शन' कहलाया। अपने सांख्य दर्शन में कपिल मुनि ने कर्मकांड के विपरीत ज्ञानकांड को महत्व दिया। उनके पहले कर्म को ही एक मार्ग माना जाता था और ज्ञान केवल चर्चा तक सीमित था।
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7. शकुंतला
शकुंतला ब्रह्मर्षि विश्वामित्र व अप्सरा मेनका की पुत्री थीं। शकुंतला को महर्षि कण्व ने पाला था। इनका विवाह चक्रवर्ती राजा दुष्यंत से हुआ था। शकुंतला के पुत्र का नाम भरत था। भरत के ही नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। भरत के ही नाम पर भरतवंश की नींव पड़ी। इसी वंश में आगे जाकर शांतनु, पांडु, धृतराष्ट्र व युधिष्ठिर आदि राजा हुए।
मां की शिक्षा से ही भरत बने चक्रवर्ती राजा
भरत का बचपन अपनी माता के साथ जंगल में बीता। यहां भरत को महर्षि कण्ड ने शिक्षा दी। राजा दुष्यंत के बाद भरत राजा बने। भरत ने अनेक देशों को जीत कर उन्हें अपने राज्य में मिला लिया। इसलिए उन्हें चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि दी गई। भरत का साम्राज्य सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में व्याप्त था जिसमें वर्तमान भारत, पाकिस्तान, अफनिस्तान, उज़्बेकिस्तान, ताज़िकिस्तान, किर्गिज़्तान, तुर्कमेनिस्तान तथा फ़ारस शामिल थे। उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।
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7. यशोदा
भगवान श्रीकृष्ण को जन्म भले ही देवकी ने दिया है, लेकिन उनकी माता के रूप में सबसे पहले यशोदा को ही याद किया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार नंदलाल पूर्व जन्म के द्रोण नामक वसु थे व यशोदा का नाम धरा था। पूर्व जन्म में इन दोनों ने भगवान विष्णु को पुत्र रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी। इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने इन्हें पुत्र सुख देने का वरदान दिया था।
श्रीकृष्ण के मुख में देखा ब्रह्मांड
कंस से रक्षा करने के लिए जब वासुदेव जन्म के बाद आधी रात में ही उन्हें यशोदा के घर गोकुल में छोड़ आए तो उनका पालन पोषण यशोदा ने किया। गोकुल में रहते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक लीलाएं की, जिनमें यशोदा को ब्रह्मांड के दर्शन, माखनचोरी और उसके आरोप में ओखल से बाँध देने की घटनाओं का सूरदास ने सजीव वर्णन किया है। यशोदा ने अपना संपूर्ण स्नेह श्रीकृष्ण पर लूटा दिया। यशोदा के लिए कहा जाता है कि जन्म देने वाले से पालने वाला बड़ा होता है। यशोदा ने बलराम के पालन पोषण की भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो रोहिणी के पुत्र और सुभद्रा के भाई थे।
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