एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है महाकालेश्वर, यहां की जाने वाली भस्मारती है विश्व प्रसिद्ध

Published : Feb 19, 2020, 05:52 PM IST

उज्जैन. मध्य प्रदेश के उज्जैन में है महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग। शिवपुराण के अनुसार, ये ज्योतिर्लिंग स्वयं प्रकट हुआ है। यहां भगवान महाकाल को राजा माना जाता है। सावन में प्रत्येक सोमवार को भगवान महाकाल की सवारी निकाली जाती है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से भक्त यहां आते हैं। महाकाल मंदिर छठवीं शताब्दी में निर्मित 12 ज्योतिर्लिगों में से एक है। ये मंदिर रुद्र सागर के निकट स्थापित है। यह मंदिर तीन तलों में विभाजित है। सबसे नीचे तल पर महाकाल ज्योतिर्लिंग स्थापित है। दूसरे तल पर ओंकारेश्वर शिवलिंग है और सबसे ऊपर नागचंद्रेश्वर स्थापित है। कैसे पहुंचे? वायुमार्ग: यहां से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट इंदौर में है, जो करीब 58 किलोमीटर है। वहां से उज्जैन आसानी से पहुंचा जा सकता है। रेलमार्ग: उज्जैन लगभग देश के सभी बड़े शहरों से रेलमार्ग से जुड़ा है। उज्जैन तक दिल्ली, मुंबई और कोलकाता से सीधी ट्रेन सेवा उपलब्ध है। सड़क मार्ग: उज्जैन में सड़कों का अच्छा जाल बिछा है और यह देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। नेशनल हाइवे 48 और नेशनल हाइवे 52 इसे देश के प्रमुख शहरों से जोड़ते हैं।

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एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है महाकालेश्वर, यहां की जाने वाली भस्मारती है विश्व प्रसिद्ध
भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट हुए थे महाकाल: पुराणों के अनुसार, अवंतिका (उज्जैन) भगवान शिव को बहुत प्रिय था। यहां भगवान शिव के कई प्रिय भक्त रहते थे। एक समय अवंतिका नगरी में एक ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मण के चार पुत्र थे। दूषण नाम का राक्षस ने अवंतिका में आतंक मचा दिया। वह राक्षस उस नगर के सभी वासियों को पीड़ा देना लगा। उस राक्षस के आतंक से बचने के लिए उस ब्राह्मण ने भगवान शिव की आराधना की। ब्राह्मण की तपस्या से खुश होकर भगवान शिव धरती फाड़ कर महाकाल के रूप में प्रकट हुए और उस राक्षस का वध करके नगर की रक्षा की। नगर के सभी भक्तों ने भगवान शिव से उसी स्थान पर हमेशा रहने की प्रार्थना की। भक्तों के प्रार्थना करने पर भगवान शिव अवंतिका में ही महाकाल ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं स्थापित हो गए।
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ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। इसलिए इस ज्योतिर्लिंग का तांत्रिक महत्व भी है।
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यहां सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व प्रसिद्ध है। मान्यता है कि पहले यह आरती मुर्दे की राख से की जाती थी, लेकिन कालांतर में ये प्रथा बंद हो गई।
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मंदिर के सबसे ऊपरी तल स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी पर खोला जाता है।
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इस मंदिर के सभी शिखर स्वर्ण मंडित हैं यानी सभी शिखरों पर सोने की परत चढ़ी है।
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मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
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