गुवाहाटी, असम. पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में असम और बांग्लादेश में अवैध घुसपैठ एक प्रमुख चुनावी मुद्दा है। भाजपा दोनों राज्यों में NRC लागू करना चाहती है, जबकि तृणमूल, कांग्रेस और अन्य दल इसके खिलाफ हैं। मंगलवार को भाजपा ने असम चुनाव के लिए अपना घोषणा पत्र जारी किया। इसमें कहा गया कि असम की सुरक्षा के लिए सही एनआरसी पर काम होगा। घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। असम में अगस्त, 2019 को एनआरसी की आखिरी लिस्ट जारी की गई थी। इसमें 3,11,21,004 लोगों को शामिल किया गया है। असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए तीन चरणों-27 मार्च, 1 और 6 अप्रैल को चुनाव होगा। मतगणना 2 मई को होगी।
असम में घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर भेजने के लिए 1951 में नेशनल रजिस्टर फॉर सिटीजन (NRC) बनाया गया था। माना जाता है कि 1971 से 1991 के बीच असम में बड़ी संख्या में मतदाता बढ़े, जो साबित करते हैं कि असम में अवैध लोगों की संख्या बढ़ी है। 1947 से 1971 तक जो भी विदेशी असम आए थे, उन्हें भारत की नागरिकता मिल चुकी है।
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NRC के मुताबिक असम में रह गए करीब 40 लाख लोगों को भारतीय नागरिकता नहीं दी गई है। इस रजिस्टर में उन लोगों को भारतीय नागरिक के तौर पर शामिल किया जाएगा, जो ये साबित कर पाएं कि वे 24 मार्च 1971 से पहले से असम में रह रहे हैं।
(अपना घोषणा पत्र जारी करती भाजपा)
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1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद बड़ी संख्या में लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) शिफ्ट हो गए थे। लेकिन इनके परिवार के कुछ लोग असम में ही रह गए। ये लोग अपने परिजनों से मिलने यहां अवैध तरीके से आते-जाते रहे।
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1979 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) और ऑल असम गण संग्राम परिषद (एएजीएसपी) ने असम में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों के खिलाफ हिंसक आंदोलन छेड़ा था। यह आंदोलन करीब 6 साल चला। अगस्त, 1985 में केंद्र सरकार और दोनों संगठनों के बीच समझौता हुआ। इसमें तय किया गया कि 1951 की एनआरसी सूची में संशोधन होगा।
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दरअसल, वोटबैंक की खातिर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के चलते सबसे अधिक गड़बड़ी हुई। अवैध प्रवासियों ने राजनीति पार्टियों के संरक्षण का लाभ उठाकर जमीन के पट्टे, राशन कार्ड, मतदाता परिचय पत्र बनवा लिए।
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2015 सुप्रीम कोर्ट ने 2009 में दायर एक जनहित याचिका के बाद अवैध घुसपैठियों पर नजर रखना शुरू हुई थी। इसके बाद 2015 में एनआरसी पर काम शुरू हुआ।
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