
धार्मिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। वह चाहती थीं कि उनकी इजाजत के बिना कोई अंदर न आए। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। यही बालक आगे चलकर गणेश कहलाए। पार्वती ने उन्हें दरवाजे पर पहरा देने को कहा। गणेश ने मां की बात को सबसे ऊपर रखा।
भगवान शिव जब पार्वती से मिलने पहुंचे तो गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। गणेश उन्हें पहचानते नहीं थे और उनके लिए मां की आज्ञा सबसे बड़ी थी। शिव ने समझाया, लेकिन गणेश अपनी जगह से नहीं हटे। बात इतनी बढ़ी कि शिव और गणेश के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन गई। यही कहानी आगे गणेश के हाथी के सिर वाली कथा से जुड़ती है।
शिव पुराण की कथा के अनुसार, शिव ने गुस्से में गणेश का सिर अलग कर दिया। पार्वती यह देखकर बहुत दुखी और नाराज हुईं। तब शिव ने गणेश को फिर जीवन देने का वचन दिया। एक हाथी का सिर लाकर गणेश के शरीर पर लगाया गया और उन्हें नया जीवन मिला।
जब गणेश जी को हाथी का सिर लगाकर नया जीवन मिला, तब माता पार्वती ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि सभी देवताओं से पहले उनकी पूजा होगी। इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु और शिव समेत देवताओं ने भी गणेश को सम्मान दिया और कहा- वे प्रथम पूज्य और विघ्नों को दूर करने वाले देवता होंगे।
कथा के अनुसार- गणेश और उनके भाई कार्तिकेय के बीच विवाह को लेकर बात आती है। दोनों के सामने शर्त रखी गई कि जो पहले पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर लौटेगा, वही पहले विवाह करेगा। कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर निकल पड़े। गणेश ने कुछ अलग किया।
गणेश ने शिव और पार्वती के चारों तरफ 7 बार चक्कर लगाए। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने दुनिया का चक्कर क्यों नहीं लगाया, तो उन्होंने कहा- उनके लिए माता-पिता ही पूरी दुनिया हैं। उनकी इस समझ और बुद्धि से शिव-पार्वती प्रसन्न हुए। यह कथा गणेश जी की बुद्धिमानी का सबसे प्रचलित उदाहरण माना जाता है।
गणेश को एकदंत यानी एक दांत वाले देवता के नाम से भी जाना जाता है। एक कथा में परशुराम और गणेश के बीच विवाद हुआ। गणेश ने शिव के घर के द्वार पर उन्हें रोक दिया। बात बढ़ी और परशुराम के प्रहार से गणेश का एक दांत टूट गया। ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणेश खंड में भी परशुराम द्वारा गणेश का दांत तोड़े जाने की कथा का जिक्र मिलता है।
महाभारत के अनुसार, महर्षि व्यास ने गणेश जी से महाभारत लिखने में मदद मांगी। गणेश ने शर्त रखी कि व्यास बिना रुके बोलते रहें। व्यास ने भी ऐसी शर्त रखी कि गणेश हर श्लोक का अर्थ समझकर ही लिखेंगे। कथा में आता है कि लेखनी टूटने पर गणेश ने अपना दांत तोड़कर उसे लेखनी बना लिया।
कुबेर को अपनी दौलत पर बहुत घमंड था। उन्होंने शिव को अपनी संपत्ति दिखाने के लिए भोज का आयोजन किया। शिव ने गणेश को वहां भेज दिया। गणेश ने खाना शुरू किया तो कुबेर के घर का भोजन कम पड़ने लगा। गणेश की भूख तब शांत हुई जब कुबेर ने अपना घमंड छोड़कर विनम्रता से उन्हें भोजन कराया।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार- एक बार गणेश जी चंद्रमा से नाराज हो जाते हैं। गणेश को देखकर चंद्रमा हंस पड़े। गणेश ने इसे अपना मजाक उड़ाना माना और चंद्रमा को श्राप दिया कि जो भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन उन्हें देखेगा, उस पर झूठा आरोप लग सकता है। इसी से गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा देखने से बचने की मान्यता जुड़ी है।
चंद्रमा ने अपनी गलती मानकर गणेश से माफी मांगी। गणेश ने अपना श्राप पूरी तरह खत्म नहीं किया, लेकिन उसे सीमित कर दिया। इसी वजह से गणेश चतुर्थी की रात चंद्रमा देखने को लेकर खास सावधानी की बात कही जाती है।
एक धार्मिक कथा में तुलसी और गणेश के बीच बातचीत का जिक्र मिलता है। तुलसी ने गणेश से विवाह की इच्छा जताई, लेकिन गणेश ने इसे स्वीकार नहीं किया। इससे नाराज तुलसी ने गणेश को श्राप दिया। गणेश ने भी जवाब में तुलसी को श्राप दिया। बाद में दोनों ने अपने-अपने श्राप को सीमित किया। इसी वजह से कई जगह गणेश पूजा में तुलसी दल नहीं चढ़ाया जाता है।
कथा के अनुसार- क्रौंच नाम का एक गंधर्व श्राप के कारण विशाल मूषक बन गया। वह इतना शक्तिशाली हो गया कि ऋषियों के आश्रम और आसपास की जगहों को नुकसान पहुंचाने लगा। जब वह गणेश जी के पास पहुंचा, तो गणेश जी ने उसे अपने पाश से पकड़ लिया और उसका घमंड तोड़ दिया। क्रौंच ने गणेश जी से क्षमा मांगी और उनकी सेवा करने की इच्छा जताई। तब गणेश जी ने उसे अपना वाहन यानी मूषक बना लिया।
कथा के अनुसार- गजमुखासुर नाम के असुर ने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके वरदान पाया था। वरदान के कारण उसे सामान्य हथियारों से हराना मुश्किल था। शक्ति मिलने के बाद वह देवताओं-ऋषियों को परेशान करने लगा। देवताओं ने गणेश जी से मदद मांगी। गणेश जी ने गजमुखासुर से युद्ध किया। उन्होंने धनुष, तलवार, फरसा जैसे कई अस्त्र चलाए, लेकिन वरदान के कारण असुर पर उनका असर नहीं हुआ। तब गणेश जी ने अपना एक दांत तोड़कर उसे ही हथियार बना लिया। गजमुखासुर इससे भी बचने के लिए चूहे का रूप लेकर भागने लगा। गणेश जी ने उसे पकड़ लिया और उसके ऊपर बैठ गए। गजमुखासुर ने अपनी हार स्वीकार कर गणेश जी से क्षमा मांगी।
मुद्गल पुराण में गणेश के 8 प्रमुख अवतारों की कथा मिलती है। मत्सरासुर ईर्ष्या और घमंड वाला राक्षस था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान शिव से वरदान पाया और फिर अपनी शक्ति के घमंड में देवताओं तथा ऋषियों को परेशान करने लगा। देवताओं ने गणेश जी से मदद मांगी। तब गणेश जी ने 'वक्रतुंड' रूप धारण किया और मत्सरासुर का सामना किया। आखिरकार मत्सरासुर ने अपनी हार मान ली और गणेश जी से क्षमा मांगी। गणेश जी ने उसे माफ कर दिया।
मुद्गल पुराण में गणेश के एकदंत रूप और मदासुर की कथा भी मिलती है। मदासुर ने शक्ति हासिल करने देवताओं और दूसरे लोगों को परेशान करने लगा। तब भगवान गणेश ने एकदंत रूप धारण किया और मदासुर का सामना किया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने गणेश जी की शरण ले ली। गणेश जी ने उसे क्षमा कर दिया।
मुद्गल पुराण में गणेश का लंबोदर अवतार भी बताया गया है। इस रूप का संबंध क्रोधासुर से जोड़ा जाता है। गणेश क्रोध की शक्ति पर विजय प्राप्त करते हैं। इसे मन के गुस्से पर नियंत्रण की कहानी माना जाता है। यानी बाहर के असुर के साथ-साथ इंसान के अंदर के क्रोध को जीतने की भी सीख मिलती है।
गणेश के विकट रूप की कथा भी मुद्गल पुराण में मिलती है। इस रूप को कामासुर के खिलाफ बताया गया है। कथा में गणेश उसके प्रभाव को खत्म करते हैं। इस कहानी में गणेश सिर्फ युद्ध करने वाले देवता नहीं, बल्कि मन को जीतने वाले देवता के रूप में सामने आते हैं।
मुद्गल पुराण में विघ्नराज नाम का गणेश रूप भी मिलता है। इसका संबंध ममासुर से बताया गया है। ममासुर को मोह और अपनी चीजों से जरूरत से ज्यादा जुड़ाव के रूप में समझाया जाता है। गणेश इस शक्ति को रोकते हैं। इसी वजह से विघ्नराज का रूप बाधाओं और गलत सोच पर जीत से जोड़ा जाता है।
गणेश के धूम्रवर्ण रूप की कथा में अभिमानासुर का जिक्र मिलता है। अभिमान यानी अपने ऊपर जरूरत से ज्यादा घमंड करना। कथा में गणेश इस असुर का सामना करते हैं और उसे कंट्रोल करते हैं। इसका सीधा संदेश है कि घमंड बढ़ जाए तो इंसान अपने रास्ते से भटक सकता है।
मुद्गल पुराण में गणेश के 8 प्रमुख अवतारों का वर्णन मिलता है। वक्रतुंड, एकदंत, महोदर, गजानन, लंबोदर, विकट, विघ्नराज और धूम्रवर्ण जैसे रूपों को अलग-अलग असुरों और अलग-अलग बुराइयों से जोड़ा गया है। यानी हर अवतार की कहानी में एक अलग तरह की समस्या और उस पर गणेश की जीत दिखाई गई है।
मुश्किल आने पर गणेश जी रास्ता निकालते हैं। कभी वे असुर को हराते हैं, कभी देवताओं की मदद करते हैं और कभी अपनी बुद्धि से समस्या का हल निकालते हैं। इसी वजह से उन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है। उनका स्मरण शुभ काम को बिना बाधा पूरा करने में मदद करता है।