
Jauhar Pratha: भारतीय इतिहास में जौहर एक ऐसी परंपरा थी, जिसका नाम आते ही चित्तौड़ और राजपूत इतिहास की वीरगाथाएं याद आती हैं। जौहर को आम तौर पर उस कंडीशन से जोड़ा जाता है, जब किसी किले की हार लगभग तय हो जाती थी और वहां रहने वाली महिलाओं के सामने बंदी बनाए जाने, अपमान या हिंसा का डर होता था। ऐसी स्थिति में महिलाएं सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश कर अपनी जान दे देती थीं। इसके बाद पुरुष योद्धा अंतिम युद्ध के लिए किले से बाहर निकलते थे। इस अंतिम लड़ाई को 'साका' कहा जाता था।
जौहर को समझने के लिए उस दौर की युद्ध व्यवस्था को समझना जरूरी है। मध्यकाल में किलों पर लंबे समय तक घेराबंदी होती थी। अगर दुश्मन सेना किले में प्रवेश करने वाली होती और बच निकलने का कोई रास्ता नहीं रहता, तो राजपूत समाज में महिलाओं के लिए जौहर करने की परंपरा थी। सामाजिक मान्यताओं में इसे सम्मान, अस्मिता और परिवार की प्रतिष्ठा की रक्षा से जोड़ा गया।
अक्सर जौहर और सती प्रथा को एक ही समझा है, लेकिन दोनों अलग परंपराएं थीं। सती का संबंध पति की मौत के बाद पत्नी के उसके अंतिम संस्कार की चिता में जाने से था, जबकि जौहर युद्ध और किले की संभावित हार की स्थिति में सामूहिक आत्मदाह से जुड़ा था। जौहर में कई महिलाएं और कभी-कभी बच्चे भी शामिल होते थे।
इतिहास में रणथंभौर के जौहर का उल्लेख 1301 में मिलता है। अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने रणथंभौर किले को घेर लिया था। हार निश्चित होने पर शासक हम्मीरदेव के पक्ष की महिलाओं द्वारा जौहर किए जाने का जिक्र मिलता है। अमीर खुसरो ने भी इस घटना का जिक्र किया था।
चित्तौड़ के पहले जौहर का संबंध 1303 में अलाउद्दीन खिलजी की घेराबंदी से जोड़ा जाता है। इसे रानी पद्मावती के नाम से सबसे ज्यादा जाना जाता है। रानी पद्मावती की कहानी का प्रसिद्ध साहित्यिक वर्णन मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ में मिलता है, जो 1540 में लिखा गया था, यानी घटना के 2 शताब्दी से ज्यादा समय बाद।
1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला किया। उस समय मेवाड़ की जिम्मेदारी रानी कर्णावती के हाथ में थी। किले की स्थिति बेहद मुश्किल होने के बाद जौहर का जिक्र मिलता है। इसके बाद राजपूत योद्धाओं ने अंतिम लड़ाई लड़ी।
अकबर के चित्तौड़ अभियान के दौरान भी जौहर का जिक्र मिलता है। यह चित्तौड़ के इतिहास में तीसरी बड़ी जौहर घटना मानी जाती है।
1528 में बाबर की सेना ने चंदेरी के किले पर हमला किया। किले की हार के बाद वहां की महिलाओं और बच्चों द्वारा जौहर किए जाने और पुरुषों के अंतिम युद्ध में उतरने का उल्लेख मिलता है।
1232 में इल्तुतमिश के ग्वालियर अभियान के दौरान भी राजपूत महिलाओं के जौहर का उल्लेख मिलता है। ग्वालियर किले में जिस स्थान को इस घटना से जोड़ा जाता है, उसे 'जौहर ताल' या 'जौहर कुंड' कहा जाता है।
जैसलमेर का किला भी जौहर और साके की घटनाओं से जुड़ा रहा है। ऐतिहासिक परंपरा में वहां 1299 और 1326 के आसपास हुए जौहर का जिक्र मिलता है। किले की घेराबंदी और हार की स्थिति में महिलाओं द्वारा जौहर तथा पुरुषों द्वारा अंतिम युद्ध किया गया।
उस समय युद्ध सिर्फ सैनिकों के बीच की लड़ाई नहीं माना जाता था। किले पर कब्जे के बाद वहां रहने वाले लोगों को बंदी बनाए जाने का खतरा रहता था। राजपूत समाज में सम्मान और अस्मिता की रक्षा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था। इसी सोच के तहत, जब हार निश्चित समझी जाती थी, तो महिलाओं द्वारा 'जौहर' और पुरुषों द्वारा अंतिम युद्ध यानी 'साका' किया जाता था।
‘जौहर’ शब्द अभी इसलिए चर्चा में है, क्योंकि अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने 31 अगस्त 2026 को दिल्ली के एक कार्यक्रम में संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत के जौहर सीन पर अपनी पुरानी आपत्ति फिर सामने रखी। उन्होंने सवाल उठाया कि जौहर को जिस तरह दिखाया गया, उससे यौन हिंसा से बची महिलाओं के जीवन को लेकर गलत मैसेज जा सकता है। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी कड़ी आलोचना होनी लगी और जौहर के ऐतिहासिक संदर्भ को लेकर बहस छिड़ गई। हालांकि, बाद में स्वरा ने सफाई दी कि उन्होंने रानी पद्मावती या जौहर करने वाली महिलाओं को कायर नहीं कहा, बल्कि उनकी बातों का गलत मतलब निकाला गया।