
नई दिल्ली. अयोध्या का नाम जेहन में आते ही हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की प्रतिद्वंदिता का आभास होने लगता है। हालांकि इसकी शुरूआत 1992 में बाबरी विंध्वस के बाद हुई। जबकि अंग्रेजों के खिलाफ अयोध्या के हिंदुओं और मुसलमानों की एक मिसाल की तरह है। दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से कई बार मोर्चा लिया, जिसका गौरवशाली इतिहास है। कई ऐसी घटनाएं हैं जो हिंदू-मुस्लिम एकता की गवाही देती हैं लेकिन यह इतिहास दोनों पक्षों के कट्टरपंथियों को नहीं सुहाता है। वे चाहते हैं उस एकता की मिसाल के बारे में कोई कुछ भी न जाने।
पहले स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम एकता
इतिहास में इस बात के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं कि 1857 के भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की ताकत हिंदू-मुस्लिम एकता थी। अयोध्या में ही इस बिरादरी के दो पुजारियों अयोध्या के मौलवी अमीर अली और प्रसिद्ध हनुमान गढ़ी मंदिर के मुख्य पुजारी बाबा राम चरण दास के नेतृत्व में मोर्चा बनाया गया था। उन्होंने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने के लिए लोगों का नेतृत्व किया। अंत में दोनों को पकड़ लिया गया और कुबेर तेल में एक इमली के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया गया था। यह स्थान अयोध्या में फैजाबाद जेल के अंदर है।
अक्कन खान व शंभु प्रसाद शुक्ल की कहानी
अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लेने वाले दो अन्य प्रमुख नेताओं अयोध्या में अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। वे थे फैजाबाद के राजा देवी बख्श सिंह के सेनापति अक्कन खान और शंभु प्रसाद शुक्ला। एकान खान और शुक्ला दोनों ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ कई सफल अभियानों का नेतृत्व किया। हालांकि बाद में अंग्रेजों की सेना ने दोनों को पकड़ लिया उन्हें एक साथ फांसी पर लटका दिया गया।
इस सूची में कई और भी नाम हैं
हिंदुओं और मुसलमानों के बीच ऐतिहासिक एकजुटता 1857 की भावना से प्रेरित थी। इन दोनों समुदायों के शासकों की शानदार सूची है, जिन्होंने उपनिवेशवादियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्होंने आवाम को हिम्मत दी, एकजुटता बनाने में मदद की। इनमें नाना साहब, बहादुर शाह सफर, रानी लक्ष्मी बाई, अहमद शाह मौलवी, थंतिया टोपे, खान बहादुर खान, हजरत महल, अजीमुल्ला खान शामिल थे। यह सूची और भी लंबी है क्योंकि ऐसे कई अंजान लोग भी थे जिन्होंने भारत की आजादी में हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
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