
भारतीय हस्तकला में ऐसी कढ़ाई हैं जो केवल देश नहीं बल्कि विदेशों में अपनी पहचान बना चुकी है। उत्तर प्रदेश की चिकनकारी, बिहार की सुजनी या फिर मध्य प्रदेश की बंजारा कढ़ाई हो, इसके बारे में ज्यादातर लोग जानते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से आंध्र प्रदेश से निकली कलमकारी एंब्रॉयडरी की डिमांड बढ़ गई है। बारीक डिजाइन, हाथों की कई बारीक पेटिंग का अनोखा मेल सदियों बाद फिर से लोगों को भा रहा है, आइए जानते हैं इस एंब्रॉयडरी के बारे में विस्तार से और खासियत।
Did you know?
Kalamkari, a timeless art from Andhra Pradesh, blends tradition, storytelling, and sustainability like no other.
With 20+ intricate steps and centuries of legacy, it’s not just an art but it’s a heritage on cloth.#DidYouKnow #Kalamkari #IndianTextiles… pic.twitter.com/efqiJ2Z6Ba— Ministry of Textiles (@TexMinIndia) April 29, 2026
कलमकारी शब्द फारसी भाषा के दो शब्दों कलम यानी पेन और कारी मतलब कारीगरी से मिल कर बना है। यह कला कपड़े पर बांस खजूर की लकड़ी से बनी खास कलम की मदद से हाथों से चित्र बनाकर उकेरी जाती है। इन चित्रों में प्राकृति से जुड़े तत्व, पशु-पक्षी, फूल पत्ती और पारंपरिक डिजाइनों का इस्तेमाल ज्यादा होता है।
कहा जाता है कलमकारी कला की जड़ें सिंधु घांटी सभ्यता तक पहुंचती है। पहले इस कला का इस्तेमाल मंदिरों में धार्मिक लोगों के लिए कपड़े बनाने के लिए किया जाता था। समय के साथ यह कला दक्षिण भारत से निकलर शाही दरबारों और फिर इंटरनेशनल मार्केट तक पहुंच गई। आज आलम यह है कि इसे भारत की सबसे प्रतिष्ठित और पारंपरिक टेक्सटाइल कलाओं में गिना जाता है।
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कलमकारी कढ़ाई को तीन प्रमुख शैलियों में बांटा गया है-
श्रीकालहस्ती कलमकारी- यह पूरी तरह से हाथों से बनाई जाता है। इसमें किसी ब्लॉक के बिना सीधे कपड़ों पर चित्र उकेरे जाते हैं। इस शैली में धार्मिक कथाएं और देवी-देवता के चित्र प्रमुख है।
मछलीपट्नम कलमकारी- इस शैली में लकड़ी के हाथ से बने ब्लॉको की मदद से प्रिटिंग की जाती है। इसमें फूल-पत्तियां, बेल-बूटे, पक्षी और फारसी डिजाइन ज्यादा देखने को मिलती है।
करुप्पर कलमकारी- इस शैली में हाथ की पेंटिंग के साथ सोने के धागों का बेहद महीन काम मिलता है।
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कलमकारी कपड़ा बनाना आसान नहीं है। इसे तैयार करने में 15-20 दिनों का वक्त लगता है। खास बात है कि इसे बनाने में किसी भी तरह के केमिकल युक्त रंग का इस्तेमाल नहीं होता है। रंग तैयार करने के लिए अनार के छिलके, हल्दी, इंडिगो, मदार की जड़े, लोहे का घोल और प्राकृतिक पौधे का उपयोग होता है। कई बार कपड़े को धोने, सुखाने और प्राकृतिक प्रक्रिया से तैयार किया जाता है ताकि सालों बाद भी इसका रंग जस का तस रहे।
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