
मुंबई. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के 24 अक्टूबर को नतीजे आएंगे। 288 सीटों वाले राज्य में भाजपा ने शिवसेना गठबंधन में चुनाव लड़ रही हैं। वहीं, कांग्रेस ने एक बार फिर एनसीपी का हाथ थामा। इस चुनाव में हम 7 ऐसी राजनीतिक घटनाओं के बारे में बता रहे हैं, जो इस विधानसभा चुनाव में पहली बार हुआ है।
1- सोनिया-प्रियंका की चुनाव प्रचार से दूरी
1998 में कांग्रेस की कमान संभालने वाली सोनिया गांधी चुनाव प्रचार में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती रही हैं। इस बार लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने कई रैलियों को संबोधित किया था। 1997 में कांग्रेस की सदस्यता लेने के बाद से यह पहला मौका है, जब सोनिया गांधी ने किसी सभा को संबोधित नहीं किया। सोनिया गांधी दिसंबर 2017 तक पार्टी की अध्यक्ष रहीं। इसके बाद कमान राहुल गांधी को मिली थी। लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद किसी एक नाम पर सहमति ना बनने की वजह से सोनिया दोबारा अगस्त 2019 में पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष बनाई गईं। इसी तरह से कांग्रेस महासचिव और लोकसभा चुनाव में उप्र की कमान संभालने वालीं प्रियंका गांधी ने एक भी रैली या रोड शो नहीं किया।
2- चुनाव में स्थानीय मुद्दे रहे बाहर
इस बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे लगभग बाहर रहे। भाजपा ने जहां पूरा जोर राष्ट्रवाद के मुद्दे पर दिया। पार्टी के नेताओं ने खुलकर कश्मीर, धारा 370, एयर स्ट्राइक, सर्जिकल स्ट्राइक का इस्तेमाल अपने भाषणों में किया। वहीं, कांग्रेस-एनसीपी ने बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था में सुस्ती को मुद्दा बनाया। राहुल गांधी ने एक बार फिर लोकसभा चुनाव की तरह राफेल को मुद्दा उठाया। यहां के स्थानीय मुद्दे जैसे सूखा, किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी जैसे मुद्दे लगभग गायब ही रहे।
3- सोनिया-राहुल गुट में बंटे नेता
विधानसभा चुनाव में मतदान से पहले कांग्रेस के नेता संजय निरुपम ने पार्टी के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस में सोनिया गांधी गुट के नेता राहुल गांधी की पसंद के नेताओं की बात नहीं सुन रहे। निरुपम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे पर भी अनदेखी का आरोप लगाया। इसी तरह से हरियाणा में भी पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने राहुल गांधी के पसंद के नेताओं की अनदेखी का आरोप लगाया और पार्टी से इस्तीफा दे दिया।
4- शिवसेना ने मराठा मुद्दा छोड़ा
इस विधानसभा चुनाव में पहली बार शिवसेना ने अपने मूल चुनावी मुद्दे (मराठा मुद्दे) से दूरी बनाए रखी। शिवसेना नेता भी इस बार अपनी सभाओं में राम मंदिर, कश्मीर जैसे मुद्दों पर बोलते दिखे।
5- 53 साल में पहली बार ठाकरे परिवार ने चुनाव लड़ा
बाल ठाकरे ने 1966 में पार्टी की नींव रखी थी। उस वक्त से ठाकरे परवार का कोई सदस्य ना तो चुनाव लड़ा और ना ही संवैधानिक पद पर रहा। पार्टी 1995 से 1999 और वर्तमान विधानसभा में दो बार सत्ता में भी रही। लेकिन इस बार महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे मुंबई के वर्ली से चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले बाल ठाकरे के भतीजे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने 2014 में चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी लेकिन बाद में उन्होंने इनकार कर दिया था।
6- पवार ने कांग्रेस-एनसीपी के चुनाव प्रचार की कमान संभाली
1999 में सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद शरद पवार उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने उनके विदेशी होने का मुद्दा उठाया था। साथ ही उनके प्रधानमंत्री बनने पर सवाल उठाए थे। इसके बाद शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अहमद ने 1999 में एनसीपी बनाई। हालांकि, राज्य और केंद्र में कई मौकों पर पवार ने कांग्रेस का समर्थन किया। दोनों पार्टियों ने लोकसभा चुनाव गठबंधन में लड़ा। यह गठबंधन विधानसभा चुनाव में भी रहा। गठबंधन में चुनाव प्रचार की कमान पवार ने संभाली। जहां एक ओर कांग्रेस के बड़े नेता प्रचार से गायब रहे तो वहीं, 78 साल के पवार ने 60 से ज्यादा रैलियां कीं। यहां तक की एक रैली के दौरान बारिश के बावजूद वे लगातार भाषण देते रहे।
7-भाजपा के सहयोगी कमल के निशान पर लड़ रहे
2014 में अलग-अलग चुनाव लड़ने वालीं भाजपा और शिवसेना ने गठबंधन किया है। शिवसेना ने 124 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, वहीं भाजपा के 150 सीटों पर उम्मीदवार हैं। यह पहला मौका है जब भाजपा-शिवसेना गठबंधन में अन्य पार्टियां जैसे आरपीआई, आरएसपी और अन्य के 14 उम्मीदवार भाजपा के निशान पर चुनाव लड़ रहे हैं।
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