अयोध्या मामला: सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में दूसरी सबसे लंबी कार्यवाही की सुनवाई

Published : Nov 09, 2019, 05:13 PM ISTUpdated : Nov 09, 2019, 08:39 PM IST
अयोध्या मामला: सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में दूसरी सबसे लंबी कार्यवाही की सुनवाई

सार

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई की इतिहास में अयोध्या विवाद की सुनवाई दूसरी सबसे लंबी कार्यवाही है, जिसमें लगातार 40 दिनों तक सुनवाई की प्रक्रिया चली।   

नई दिल्ली. राजनीतिक और धार्मिक रूप से संवेदनशील दशकों पुराने अयोध्या मंदिर-मस्जिद भूमि विवाद में 40 दिनों तक चली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में दूसरी सबसे लंबी कार्यवाही थी। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में 2.77 एकड़ जमीन को लेकर हाई वोल्टेज सुनवाई 6 अगस्त को शुरू हुई थी और 16 अक्टूबर को समाप्त हुई। इसके बाद कोर्ट ने शनिवार को अपना निर्णय सुनाया। पांच जजों की बेंच ने अपने सर्वसम्मत फैसले में विवादित जगह पर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ कर दिया और केंद्र सरकार को मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ भूमि देने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने भारत के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और बहुप्रतीक्षित निर्णयों में शामिल एक सदी से अधिक पुराने विवाद को खत्म कर दिया।

68 दिनों तक हुई थी सुनवाई 

1973 में केशवानंद भारती मामले के बाद इस मामले में दलीलें दूसरी सबसे लंबी चली हैं।  ऐतिहासिक केशवानंद मामले में  संविधान की बुनियादी संरचना के सिद्धांत को प्रतिपादित करने की कार्यवाही 68 दिनों तक चली थी।

अंतिम दिन हुई थी मैराथन सुनवाई 

अंतिम दिन हुई मैराथन सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि सभी पक्षकारों की दलीलें पर्याप्त हैं। अंतिम दिन को मुस्लिम दलों के वरिष्ठ वकील राजीव धवन द्वारा किए गए हाईवोल्टेज ड्रामे के बीच हिंदू महासभा ने अयोध्या में भगवान राम के जन्म स्थान का स्पष्ट रूप से चित्रण करते हुए
मानचित्र को दिखाया था।

आधार योजना पर 38 दिन तक चली थी सुनवाई 

सुप्रीम कोर्ट ने अदालत में तीसरी सबसे लंबी सुनवाई आधार योजना की वैधता पर थी। जिस पर कोर्ट में  38 दिनों तक सुनवाई चली थी और यह 1950 में अस्तित्व में आई थी। जस्टिस एसए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नजीर की बेंच ने भी एक से अधिक बार सुनवाई के लिए अयोध्या विवाद के लिए समय-सारणी तय की थी और 18 अक्टूबर तक सुनवाई की तारीख को निर्धारित किया था। बाद में इसे कोर्ट ने घटाकर 17 अक्टूबर तक कर दिया था। 

मध्यस्थता की उठी थी मांग 

मैराथन सुनवाई के दौरान पक्षकारों द्वारा गर्मागर्मी हुई थी और इस बीच अयोध्या मसले को  मध्यस्थता के माध्यम से निपटाने की बात कही गई थी। बता दें कि 6 अगस्त से दिन-प्रतिदिन की सुनवाई शुरू करने से पहले की गई मध्यस्थता किसी नतीजे पर पहुंचने में विफल रही। बाद में मध्यस्थता के लिए बनाई गई एक शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश, आर्ट ऑफ़ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर, श्रीराम पंचू के नेतृत्व में पैनल का गठन किया गया, जो सुनवाई से पहले मामले को सुलह से सुलझाने की कोशिश कर रहा था। इसके बाद मध्यस्थता कर रहे पैनल ने सुनवाई की आखिरी तारीख पर अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दी। सूत्रों ने कहा था कि रिपोर्ट हिंदू और मुस्लिम दलों के बीच एक समझौते की तरह थी, जिसमें सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्वाणी अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा, राम जन्मभूमि पुनरूद्धार समिति और कुछ अन्य हिंदू पक्ष विवादास्पद भूमि विवाद को निपटाने के पक्ष में थे।

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