तड़पता रहा युवक, हाथ जोड़ गिड़गिड़ाती रही पत्नी…फिर भी नहीं मिली मदद-झकझोर देने वाला Video

Published : Dec 17, 2025, 02:29 PM IST
 bengaluru humanity failed roadside death wife begs help

सार

बेंगलुरु में इलाज और मदद न मिलने से 34 वर्षीय युवक की सड़क पर मौत हो गई। पत्नी हाथ जोड़कर मदद मांगती रही, लेकिन कोई नहीं रुका। इंसानियत फेल हुई, फिर भी परिवार ने आंखें दान कर मानवता की मिसाल पेश की।

Bengaluru Humanity Failed Video: बेंगलुरु में सामने आई एक दर्दनाक घटना ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, बल्कि एक आम परिवार की सच्ची हकीकत है, जहां इलाज, अस्पताल, एम्बुलेंस और राहगीर-सभी ने साथ छोड़ दिया। सवाल यही है कि क्या बड़े शहरों में अब इंसानियत सिर्फ शब्दों तक रह गई है?

आखिर क्या हुआ उस रात जब मदद सबसे ज्यादा जरूरी थी?

देश की हाईटेक सिटी मानी जाने वाली बेंगुलुरू के बालाजी नगर निवासी 34 वर्षीय वेंकटरमनन एक साधारण गैरेज मैकेनिक थे। मेहनत करके परिवार चलाने वाले वेंकटरमनन को रोज की तरह सुबह करीब 3:30 बजे अचानक सीने में तेज़ दर्द उठा। दर्द इतना ज्यादा था कि वह खुद बाइक भी नहीं चला पा रहे थे। उनकी पत्नी उन्हें तुरंत मेडिकल मदद दिलाने के लिए मोटरसाइकिल से अस्पताल ले गई।

 

 

क्या अस्पतालों का दरवाजा सच में बंद था?

पहले अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि वहां डॉक्टर ड्यूटी पर ही नहीं थे। इसके बाद वे दूसरे अस्पताल गए, जहां डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें स्ट्रोक आया है और किसी दूसरे अस्पताल ले जाने की सलाह दे दी। इस दौरान पत्नी लगातार एम्बुलेंस सेवाओं को फोन करती रही, लेकिन कोई ठोस मदद नहीं मिली।  पत्नी गिड़गिड़ाती रही, मदद की गुहार लगाती रही लेकिन हर जगह से उसे मायूसी ही मिली।

जब सड़क ही बन गई मौत की जगह

लगातार दो अस्पतालों से लौटने के बाद, पति-पत्नी सड़क पर ही एक हादसे का शिकार हो गए। वेंकटरमनन दर्द से कराहते हुए सड़क पर पड़े रहे। उनकी पत्नी खून से लतपथ हालत में हाथ जोड़कर हर गुजरती गाड़ी से मदद मांगती रही। CCTV फुटेज में साफ दिखता है कि कई वाहन वहां से गुज़र गए, लेकिन कोई नहीं रुका। उस दंपत्ति के न तो जख्म और न ही गुहार किसी राहगीर को द्रवित कर पाई।

क्या शहर की रफ्तार इंसानियत से तेज़ हो गई है?

कई मिनटों तक कोई मदद नहीं मिली। आखिरकार एक कैब ड्राइवर रुका और वेंकटरमनन को पास के अस्पताल ले गया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। जख्मी पत्नी का इलाज चल रहा है। 

मौत के बाद भी परिवार ने दिखाई इंसानियत

इस पूरी घटना ने परिवार को तोड़ दिया, लेकिन इंसानियत उनसे नहीं छीनी। परिवार ने वेंकटरमनन की आंखें दान कर दीं, ताकि उनकी मौत के बाद भी किसी को रोशनी मिल सके। पत्नी ने कहा, “इंसानियत मेरे पति को नहीं बचा सकी, लेकिन हमने अपना फर्ज़ निभाया।”

दो मासूम बच्चों का भविष्य अब किसके भरोसे?

वेंकटरमनन के परिवार में अब उनकी पत्नी, मां और दो छोटे बच्चे हैं- एक पांच साल का बेटा और 18 महीने की बेटी। मां अपने आखिरी बेटे को खो चुकी हैं और सास सरकार से सवाल कर रही हैं कि अब उनकी बेटी और बच्चों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

क्या यह सिर्फ एक हादसा है या सिस्टम की नाकामी?

यह घटना सिर्फ एक मौत की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे स्वास्थ्य सिस्टम, आपात सेवाओं और समाज की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल है। बेंगलुरु जैसी महानगर में अगर ऐसी हालत है, तो बाकी जगहों का क्या हाल होगा?

 

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