
नई दिल्ली. प्रमोद महाजन ने भारतीय राजनीति में उस समय चाणक्य का दर्जा हासिल किया था, जब आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता पार्टी की बागडोर संभालते थे। प्रमोद का राजनीतिक करियर जितना शानदार था, उनकी मौत उतनी ही दर्दनाक थी। आम जीवन में प्रमोद बहुत जल्दी गुस्सा हो जाते थे। इस बारे में सवाल पूछे जाने पर उन्होंने स्वीकार किया था कि जल्दी गुस्सा आना उनकी आदत में हैं और उन्हें इस बात का अफसोस भी है।
तेजी से तय किया शिखर तक का सफर
प्रमोद महाजन ने बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के बहुत ही कम समय में बड़े नेता का दर्जा हासिल कर लिया था। वाजपेयी और आडवाणी जैसे नेताओं के रहते पार्टी में अपनी पहचान बनाना मुश्किल था, पर प्रमोद ने न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि भाजपा के चाणक्य का दर्जा भी हासिल किया। प्रमोद की राजनीतिक छवि एक तेज तर्रार और मैनेजर किस्म के नेता की थी। प्रमोद ने बहुत ही कम समय में भाजपा के शीर्ष नेताओं की सूची में अपना नाम शामिल करवाया था।
जल्दी गुस्सा हो जाते थे महाजन
प्रमोद महाजन शॉर्ट टेंपर्ड स्वभाव के थे। उन्हें कई मौकों पर बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता था। प्रमोद अपनी इस आदत से छुटकारा पाना चाहते थे। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था "जहां तक स्वतंत्र मानवीय मनोवृति का सवाल है...उसे मैं कोई गलत नहीं मानता, लेकिन अगर आपका ये आरोप है कि मैं शॉर्ट टैंपर्ड हूं, या मुझे जल्दी गुस्सा आता है तो मैं समझता हूं कि हां, ये दोष मेरे में है, इस दोष को कम करने की कई बार में कोशिश करता हूं, लेकिन कभी-कभार वह उभर के आ जाता है।"
छोटे भाई ने की थी हत्या
प्रमोद की मौत बहुत ही दर्दनाक तरीके से हुई थी। 22 अप्रैल 2006 की सुबह प्रमोद की अपने छोटे भाई से बहस शुरू हो गई। लगभग 15 मिनट तक दोनों भाई बहस करते रहे। इसके बाद उनके छोटे भाई ने एक के बाद एक लगातार तीन गोलियां प्रमोद के सीने में दाग दी। आनन-फानन में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने 12 दिनों तक उन्हें बचाने का प्रयास किया, पर 3 मई को प्रमोद इस दुनिया को अलविदा कह गए। दोनों भाई किस बात पर झगड़ रहे थे इसकी जानकारी किसी को नहीं है, पर इस घटना के बाद उनके छोटे भाई सभी नजरों में हमेशा के लिए विलेन बन गए।
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