
बेंगलूरु। कर्नाटक की राजनीति इस समय एक बड़े और दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। कांग्रेस सरकार के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही खींचतान एक बार फिर सुर्खियों में है। इसी बीच, राज्य कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने एक ऐसा बयान दिया जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। उन्होंने कहा “वर्ड पावर, वर्ल्ड पावर…वादा निभाना ही सबसे बड़ा पावर मूव है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब 1 दिसंबर को संभावित पावर शिफ्ट की तारीख के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल और तेज हो गया है-क्या कर्नाटक में दोबारा सत्ता का चेहरा बदलने वाला है?
एक इवेंट के दौरान डीके शिवकुमार ने कहा, “वर्ड पावर वर्ल्ड पावर है”, यानी शब्द की ताकत दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वादा निभाना एक बड़ी जिम्मेदारी और मजबूत नेतृत्व की पहचान है। इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक साफ तौर पर रोटेशनल चीफ मिनिस्टरशिप की याद दिलाने के तौर पर देख रहे हैं। कांग्रेस के भीतर यह चर्चा लंबे समय से चल रही है कि 2023 विधानसभा चुनाव के बाद CM पद को ढाई-ढाई साल के लिए बांटने का एक अनौपचारिक समझौता हुआ था—एक हिस्सा सिद्धारमैया और दूसरा हिस्सा डीके शिवकुमार के लिए। अब, जब वह ढाई साल पूरा होने के करीब है, तभी शिवकुमार का यह बयान सामने आना कई संकेत छोड़ जाता है।
इवेंट में शिवकुमार ने एक और दिलचस्प बात कही-“जो लोग मेरे पीछे खड़े हैं, उन्हें कुर्सी की कीमत नहीं पता।” इस कथन के बाद हॉल में हंसी जरूर गूंजी, पर इस बात में छुपा संदेश राजनीति समझने वालों को साफ सुनाई दिया। कुर्सी यानी सत्ता, और सत्ता का यह खेल फिलहाल कांग्रेस के भीतर उबाल पर है। टीम सिद्धारमैया रोटेशनल CM वाली बात को नकारती है, जबकि शिवकुमार के समर्थक बार-बार इसे याद दिलाते रहते हैं।
पिछले कुछ हफ्तों में डीके शिवकुमार कैंप के कई MLA दिल्ली के चक्कर लगा रहे हैं, जिससे राजनीति में अटकलों की आग और तेज हो गई है। NDTV की रिपोर्टों में दावा किया गया है कि 1 दिसंबर वह डेडलाइन है जब कर्नाटक की सत्ता में बड़ा बदलाव हो सकता है।
कांग्रेस हाईकमान ने कहा है कि वे विवाद का समाधान जल्द निकालेंगे। कांग्रेस चीफ मल्लिकार्जुन खड़गे ने साफ कहा: “राहुल जी, सोनिया जी और मैं मिलकर इस मुद्दे पर फैसला लेंगे।” सिद्धारमैया भी मानते हैं कि “आखिरी फैसला हाईकमान का है। इस कंफ्यूजन को खत्म करने के लिए हाईकमान को कदम उठाना ही होगा।” दूसरी ओर, शिवकुमार सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि उन्होंने कभी मुख्यमंत्री पद की मांग नहीं की। पर उनका हर बयान सत्ता परिवर्तन की ओर इशारा करता दिख रहा है।
यह सबसे बड़ा सवाल है। सत्ता का खेल, वादों की राजनीति और अंदरूनी खींचतान-इन सबके बीच कर्नाटक की राजनीति आज देशभर का ध्यान खींच रही है। क्या 1 दिसंबर को नया पावर मूव सामने आएगा? या फिर यह राजनीतिक रणनीति का एक और अध्याय है? सस्पेंस अभी बाकी है।
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