
Fighter Jet Engine India: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में भारत में लड़ाकू विमानों का इंजन बनाने का आह्वान किया है। हमारा देश आज अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी ताकत है। अग्नि 5 और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें हमारे पास हैं, लेकिन लड़ाकू विमानों के इंजन बनाने की क्षमता नहीं। ऐसा नहीं कि इस क्षेत्र में कोशिश नहीं की गई। कावेरी इंजन पर लंबे समय से काम चल रहा है, लेकिन यह अब तक फाइटर जेट को ताकत देने लायक नहीं बन सका है। हम स्वदेशी फाइटर जेट तेजस बना रहे हैं, लेकिन इसके इंजन के लिए दूसरे देश पर निर्भर हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि लड़ाकू विमान का इंजन बनाना इतना मुश्किल क्यों है?
आज फाइटर जेट इंजन बनाने की क्षमता अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास ही है। यह बेहद क्रिटिकल टेक्नोलॉजी है जो कोई देश दूसरे को देने को तैयार नहीं। इन इंजनों को बनाना एयरोस्पेस इंडस्ट्री में सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण कामों में से एक है।
लड़ाकू जेट इंजन बनाने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक एडवांस सामग्रियों का विकास और अधिग्रहण है। ये इंजन 1500 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान और अत्यधिक दबाव में काम करते हैं। इन्हें तैयार करने के लिए हल्की, मजबूत, टिकाऊ और गर्मी बर्दाश्त करने वाली सामग्री चाहिए। सिंगल-क्रिस्टल सुपरअलॉय या सिरेमिक मैट्रिक्स कंपोजिट जैसी सामग्रियों का विकास समय लेने वाला और महंगा है।
फाइटर जेट इंजन तैयार करने में एक भी कमी नहीं रखी जा सकती। थोड़ी सी भी कमी हुई तो यह विनाशकारी साबित हो सकती है। ऐसी सटीकता प्राप्त करने के लिए 5- एक्सिस सीएनसी मशीनिंग और एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (3डी प्रिंटिंग) जैसी एडवांस मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी चाहिए। बड़े पैमाने पर उत्पादन में एकरूपता बनाए रखना चुनौती होती है।
फाइटर जेट इंजनों की सप्लाई चेन विशाल और जटिल है। इसमें दुनिया भर के कई सप्लायर शामिल हैं। वे महत्वपूर्ण पुर्जे देते हैं। प्रत्येक पुर्जे की गुणवत्ता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना बड़ा काम है। सप्लाई चेन में बाधा (चाहे भू-राजनीतिक मुद्दों, प्राकृतिक आपदाओं या क्वालिटी कंट्रोल समस्याओं के कारण हों) इंजन बनाने के कार्यक्रम को प्रभावित कर सकते हैं।
लड़ाकू जेट इंजनों को कठोर टेस्ट और क्वालिटी चेक से गुजरना पड़ता है। इसके प्रत्येक पुर्जे और सिस्टम की गहराई से जांच होती है। इससे तय होता है कि वह पुर्जा लड़ाई के दौरान पड़ने वाले तनावों का सामना कर सकता है। इसमें विभिन्न परिस्थितियों में सहनशीलता टेस्ट, गर्मी सहने की क्षमता की जांच और प्रदर्शन मूल्यांकन शामिल हैं। ये टेस्ट महंगे और समय लेने वाले होते हैं। इंजन की विश्वसनीयता और सुरक्षा तय करने के लिए ये जरूरी हैं।
लड़ाकू विमान का इंजन बनाने के लिए सबसे जरूरी ऐसा करने की टेक्नोलॉजी होना है। इसमें भी लगातार इनोवेशन करना होता है। अधिक शक्तिशाली, कुशल और कम गर्मी पैदा करने वाले इंजन की मांग है। इसके चलते निर्माताओं को लगातार इनोवेशन करना होता है। एडेप्टिव साइकिल इंजन या हाइब्रिड-इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम जैसी नई तकनीकों को शामिल करने के लिए पर्याप्त रिसर्च एंड डेवलपमेंट की जरूरत होती है। इसके लिए बड़ा निवेश करना होता है।
कावेरी इंजन लड़ाकू विमान के लिए बनाया जा रहा इंजन है। इसे DRDO के अंतर्गत गैस टर्बाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान (GTRE) द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित किया जा रहा है। यह 80 किलोन्यूटन (kN) थ्रस्ट वाला लो बाईपास, ट्विन स्पूल टर्बोफैन इंजन है। कावेरी परियोजना भारत में 1980 के दशक में शुरू की गई थी। यह आज तक तैयार नहीं हो सका है।
कावेरी इंजन को पहले तेजस फाइटर जेट में लगाया जाना था, लेकिन 2008 में तकनीकी चुनौतियों के कारण इस इंजन को तेजस से अलग करना पड़ा। यह जरूरी थ्रस्ट-टू-वेट अनुपात प्राप्त नहीं कर सका था। इसमें बहुत अधिक तापमान पर धातु विज्ञान संबंधी कमियां, आफ्टरबर्नर प्रदर्शन और विश्वसनीयता संबंधी परेशानी थी।
कावेरी इंजन Tejas Mk1 की जरूरतों को पूरा नहीं कर सका तो इस विमान के लिए अमेरिका में बने GE F404 इंजन खरीदने का फैसला लिया गया। तकनीकी चुनौतियों के अलावा भारत में ऐसे इंजनों के टेस्ट के लिए सुविधाओं की कमी है। कावेरी इंजन के टेस्ट के लिए भारत को रूस पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे देर होती है।
कावेरी इंजन रूस में फ्लाइट टेस्ट से गुजर रहा है। करीब 25 घंटे का टेस्ट बाकी है। इस इंजन का इस्तेमाल अब भारत के स्वदेशी लंबी दूरी के मानवरहित लड़ाकू हवाई वाहनों (UCAV), जैसे घातक स्टील्थ ड्रोन, को ताकत देने के लिए हो रहा है।
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