
मुंबई। सुशांत सिंह राजपूत सुसाइड केस में सीबीआई ने अपनी जांच शुरू कर दी है। सुसाइड मामले में कई लोगों की संदिग्ध भूमिका लेकर अलग-अलग तरह की चर्चा है। सुशांत के पिता ने पटना में कराई नामजद एफ़आईआर में बेटे की मौत के पीछे गहरी साजिश की आशंका जताई थी। बाद में बिहार की एनडीए सरकार ने सीबीआई से जांच की सिफ़ारिश की और केंद्र ने उसे मंजूर भी कर लिया था।
हालांकि रिया चक्रवर्ती सुप्रीम कोर्ट के जरिए सीबीआई की भूमिका को रोकना चाहती थीं, लेकिन कोर्ट उनसे सहमत नहीं हुआ। सुशांत केस में केंद्रीय एजेंसी के आने के बाद एजेंसी की भूमिका, ट्रैक रिकॉर्ड, काम करने के तरीके और स्ट्रक्चर को लेकर काफी बातें हो रही हैं। इन जानकारियों के साथ ऐसे हाई प्रोफाइल केसों पर भी बात करेंगे जिसकी एजेंसी ने जांच की।
सीबीआई को भारत का इंटरपोल कहा जाता है। एनआईए बनने से पहले 2008 तक यह देश की एकमात्र केंद्रीय जांच एजेंसी थी। इसके गठन की एकहानी कम दिलचस्प नहीं है। दरअसल, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश इंडिया में इसका गठन तब हुआ था जब "वार डिवीजन" में अवैध दलाली और पैसों के लेन-देन का मामला सामने आया। तब यानी 1941 में वार डिवीजन के तहत इन्हीं बातों की जांच के लिए एक स्पेशल पुलिस टीम का गठन किया था। आगे चलकर देश की आजादी के बाद धीरे-धीरे इसकी भूमिका बढ़ती गई और आज ये सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) के रूप में हमारे बीच है।
#सीबीआई का दायरा क्या है?
करप्शन मामलों की जांच के लिए गठित संस्था का आगे चलकर दायरा बढ़ता गया और ये दूसरे मामलों की भी जांच करने वाली देश की सबसे बड़ी केंद्रीय एजेंसी बन गई। इसे भारत का इंटरपोल मान सकते हैं, जो दुनिया की दूसरी जांच एजेंसियों के साथ काम करती है। राजस्थान के चर्चित भंवरी देवी-मदेरण केस में अमेरिकी एजेंसी एफ़बीआई की फोरेंसिंक टीम से अहम मदद मिली थी। सीबीआई के अलावा 2008 में मुंबई ब्लास्ट के बाद एनआईए के रूप में एक और केंद्रीय जांच एजेंसी का अस्तित्व सामने आया था। हालांकि एनआईए का काम सिर्फ आतंकी मामलों की जांच करना है। जबकि सीबीआई करप्शन, आर्थिक अपराध के मामलों और अपराध के विशेष मामलों (जैसे- सुशांत और जिया खान केस) में जांच करती है।
#किसी केस में ऐसे होती है सीबीआई की एंट्री
हालांकि किसी भी मामले में सीबीआई के शामिल होने की एक प्रक्रिया है। सीबीआई सिर्फ उन्हीं मामलों में सीधे-सीधे एंट्री लेती है जो भ्रष्टाचार, मानव और ड्रग तस्करी, संगठित अपराध आदि से जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में किसी व्यक्ति की शिकायत पर सीबीआई जांच या कार्रवाई कर सकती है। किसी केस में सीबीआई की जांच के लिए जरूरी है कि नियमों के तहत कोई राज्य सरकार केंद्र सरकार से सिफ़ारिश करे और उसे मंजूर कर लिया जाए। सुशांत के केस में बिल्कुल ऐसा ही हुआ। दूसरी स्थिति में ऊपर बताई गई कैटेगरी के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट जांच करने का निर्देश दे। जैसे पिछले साल आईआईटी स्टूडेंट फातिमा लतीफ़ सुसाइड केस में मद्रास हाईकोर्ट ने सीबीआई को जांच का निर्देश दिया था।
#सीबीआई में कैसे आते हैं कर्मचारी-अफसर
चारों महानगर समेत देश के सभी राज्यों में मौजूद सीबीआई का अपना स्ट्रक्चर भी कम दिलचस्प नहीं है। सब इंस्पेक्टर तक का पद, कर्मचारी चयन आयोग (SSC) के जरिए भरा जाता है। जबकि इससे ऊपर के पदों पर डेपुटेशन के जरिए नियुक्तियां होती हैं। प्रतिनियुक्ति यानी डेपुटेशन का मतलब यह है कि राज्य और केंद्र शासित राज्यों के पुलिस अफसरों को सीबीआई में अपॉइंट किया जाता है। पुलिस सेवा के अलावा भी राज्यों के दूसरे अफसरों को भी डेपुटेशन के जरिए एजेंसी में लिया जाता है। कई केसों में पेशेवर एक्सपर्ट्स की भी मदद ली जाती है। सबसे बड़ा पद "डायरेक्टर" का होता है। सुशांत केस में शामिल मनोज शशिधर, गगनदीप और नूपुर प्रसाद ऐसे ही आईपीएस अफसर हैं जो डेपुटेशन से सीबीआई में पहुंचे।
#सीबीआई का बॉस कौन?
सीबीआई का सुपरविजन केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) करता है। सीबीआई का अपना एक विजिलेन्स, कर्मचारियों के काम की निगरानी करता है। एजेंसी में पुलिस और ऑफिसर स्टाफ के आलव एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ, लॉ ऑफिसर, टेक्निकल पोस्ट और लैब साइंटिस्ट जैसे पोस्ट और डिमार्टमेंट हैं। इस समय केंद्रीय एजेंसी का सालाना बजट 802 करोड़ रुपये है। केंद्रीय एजेंसी में कुल मंजूर कर्मचारियों की संख्या 7 हजार से ज्यादा है।
#इन केसों से क्या समझें, सीबीआई फेल या पास?
1. पुरुलिया आर्म ड्रॉप केस: 1995 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में हवाई जहाज से 300 एके 47 जैसे अत्याधुनिक हथियार और गोला बारूद गिराया गया था। इस मामले की जांच सीबीआई ने की। जांच में कुछ संगठनों और विदेशियों के शामिल होने की बात सामने आई। एक अहम आरोपी के रूप में डेनमार्क के नागरिक किम डेवी का नाम सामने आया था। लेकिन प्रत्यर्पण न होने की वजह से सीबीआई की जांच किम डेवी से पूछताछ पर अटक गई है।
2. भंवरी देवी मर्डर केस: 2011 में एक प्राइवेट सीडी आने के बाद राजस्थान की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के पूर्व मंत्री महिपाल मदेरणा और विधायक मलखान सिंह बिश्नोई के खिलाफ भंवरी देवी नाम की महिला का अपहरण और हत्या का आरूप लगा। इस मामले की जांच भी सीबीआई ने की थी। हालांकि एजेंसी केस में जरूरी गवाह पेश नहीं कर पाई है। आरोपी जेल में हैं।
3. रुचिका गहरोत्रा: 1993 में नाबालिग टेनिस खिलाड़ी रुचिका गहरोत्रा ने सुसाइड कर की थी। मामले में 1990 के दौरान हरियाणा पुलिस के तत्कालीन इंस्पेक्टर जनरल एसपीएस राठौड़ पर ऑफिस में ही छेड़खानी, रुचिका के परिवर को परेशान करने और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा। कोर्ट के आदेश पर 1998 में सीबीआई ने जांच की। 2010 में चार्जशीट में राठौड़ के खिलाफ़ सुसाइड के लिए उकसाने को लेकर नया मामला दर्ज हुआ। हालांकि कोर्ट ने छेड़छाड़ का दोषी माना, लेकिन सुसाइड के लिए जिम्मेदार नहीं माना।
#और सीबीआई के इन हाइप्रोफ़ाइल केसों में क्या हुआ?
बोफोर्स घोटाला (1989), परवीन बाबी सुसाइड केस (2005), 2जी और कोल स्कैम (2007-2009) ऐसे केस हैं जिसे सीबीआई ने हैंडल किया पर उसके हाथ कुछ नहीं लगा। ठीक इसी तरह आरुषि-हेमराज, विधायक कृष्णानंद राय, रणवीर सेना चीफ ब्रह्मेश्वर मुखिया और नवरुणा मर्डर केस में भी सीबीआई कुछ नहीं कर पाई। जिया खान सुसाइड केस (2013) के रूप में ऐसे भी मामले हैं जिनका पता नहीं चल सका है। आरुषि-हेमराज केस में सीबीआई जांच की खूब किसकीरी हुई है।
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