तो बिल्कुल अलग होते हरियाणा के चुनाव नतीजे, इन वजहों से पिछड़ गई बीजेपी

Published : Oct 26, 2019, 07:30 AM IST
तो बिल्कुल अलग होते हरियाणा के चुनाव नतीजे, इन वजहों से पिछड़ गई बीजेपी

सार

हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी 40 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने है। सरकार समर्थन लेकर सरकार बनाने की कयावद में है। इस बार राज्य में बीजेपी के लिए कई चीजें फायदेमंद नहीं रहीं। पार्टी को दलितों का वोट नहीं मिला। इसका नतीजा है कि राज्य की दलित बहुल सीटों पर कमल नहीं खिल पाया। जबकि कांग्रेस ने ऐसी तमाम सीटों पर बाजी मारी है।

चंडीगढ़. हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी 40 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने है। सरकार समर्थन लेकर सरकार बनाने की कयावद में है। इस बार राज्य में बीजेपी के लिए कई चीजें फायदेमंद नहीं रहीं। पार्टी को दलितों का वोट नहीं मिला। इसका नतीजा है कि राज्य की दलित बहुल सीटों पर कमल नहीं खिल पाया। जबकि कांग्रेस ने ऐसी तमाम सीटों पर बाजी मारी है।

हरियाणा में करीब 20 फीसदी दलित समुदाय है, जो करीब 32 विधानसभा सीटों पर अहम भूमिका निभाता है। राज्य में 17 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इस बार विधानसभा चुनाव में सुरक्षित  17 सीटों में बीजेपी 5, कांग्रेस 7 और अन्य के खाते में 5 सीटें आईं। जबकि 2014 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो इन 17 सुरक्षित सीटों में से बीजेपी को 9, कांग्रेस को 4, इनेलो को 3 और अन्य को 1 सीट मिली थी।

साफ है कि यहां बीजेपी को 4 और इनेलो को 3 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है। कांग्रेस का कुमारी शैलजा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का दांव सफल रहा। पार्टी को तीन सीटों का फायदा मिला है।

मेवात में साफ
हरियाणा के मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों के नतीजों में बीजेपी के हाथ मायूसी है। हरियाणा में करीब 8 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, मेवात इलाके में 70 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। यही वजह है कि मेवात में मुस्लिम प्रत्याशी ही जीतकर विधानसभा पहुंचते हैं।

बीजेपी ने मुस्लिम बहुल सीटों पर कमल खिलाने के लिए दो मुस्लिम चेहरे उतारे थे। मेवात के नूंह में जाकिर हुसैन और फिरोजपुर झिरका सीट पर नसीम अहमद को प्रत्याशी बनाया था। जिले की पुन्हाना सीट पर नौक्षम चौधरी को उम्मीदवार बनाया था। इसके बावजूद पार्टी यहां जीत नहीं पाई। नूंह, फिरोजपुर झिरका और पुन्हाना विधानसभा सीट कांग्रेस ने जीत लिया।

क्या बीजेपी ने खोया जाटों का भरोसा?
राज्य के जाट बहुल सीटों पर भी बीजेपी का यही हाल रहा। राज्य में जाट समुदाय की आबादी करीब 30 फीसदी है। पार्टी ने इस बार कुल 20 जाट प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। इनमें से सिर्फ महज पांच ही जीतने में कामयाब हुए। कैप्टन अभिमन्यू, ओम प्रकाश धनकड़ और सुभाष बराला जैसे दिग्गज जाट नेता अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह की पत्नी को भी हार का सामना करना पड़ा।

बबिता फोगाट और सोनाली फोगाट जैसे सेलिब्रिटी जाट चेहरों को उनके समुदाय ने नकार दिया। जाट बहुल इलाकों में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस ने 12 सीटें जीतीं। दुष्यंत चौटाला की जेजीपी भी 5 सीटें जीतने में कामयाब रही।

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