बाबरी विध्वंस : फर्जी षड्यंत्र के आरोप में 3 दशक बाद न्याय

Published : Sep 30, 2020, 09:55 PM IST
बाबरी विध्वंस : फर्जी षड्यंत्र के आरोप में 3 दशक बाद न्याय

सार

करीब 3 दशक पहले कांग्रेस ने नरसिम्हा राव सरकार पर बाबरी मस्जिद विध्वंस के दुर्भाग्यपूर्ण मामले में सीबीआई द्वारा आपराधिक साजिश का मामला दर्ज करने का दबाव डाला। बाबरी मस्जिद विध्वंस भीड़ द्वारा स्वाभाविक तौर पर किया गया था। इस पर कभी संदेह नहीं रहा। आडवाणी जी समेत अधिकांश भाजपा नेताओं ने मस्जिद तोड़ने से भीड़ को रोकने के लिए तमाम प्रयास भी किए थे। 

राजीव चंद्रशेखर, राज्यसभा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता

करीब 3 दशक पहले कांग्रेस ने नरसिम्हा राव सरकार पर बाबरी मस्जिद विध्वंस के दुर्भाग्यपूर्ण मामले में सीबीआई द्वारा आपराधिक साजिश का मामला दर्ज करने का दबाव डाला। बाबरी मस्जिद विध्वंस भीड़ द्वारा स्वाभाविक तौर पर किया गया था। इस पर कभी संदेह नहीं रहा। आडवाणी जी समेत अधिकांश भाजपा नेताओं ने मस्जिद तोड़ने से भीड़ को रोकने के लिए तमाम प्रयास भी किए थे। 

कांग्रेस सरकार और सीबीआई द्वारा आपराधिक साजिश के इस मामले को दायर करना, वास्तव में असली षड्यंत्र था। यह साजिश अगले तीन दशकों तक अपनी वोट बैंक की राजनीति करने के लिए कांग्रेस द्वारा रची गई थी। 

कितने मुसलमानों ने अपने समुदाय के विकास पर ध्यान ना देकर कांग्रेस के झूठ के आधार पर बिना सोचे समझे उसे वोट किया। कांग्रेस की मंशा हमेशा साफ रही है कि बाबरी की दुखद घटना का इस्तेमाल भाजपा नेतृत्व के खिलाफ किया जाए और भारतीय मुसलमानों में भाजपा से डर का माहौल बनाकर उन्हें वोटबैंक बनाया जाए।

'अपराधिक साजिश के नहीं मिले सबूत'
अदालत ने साफ कहा कि इसके कोई सबूत नहीं हैं कि यह अपराधिक साजिश थी। इसके अलावा कोर्ट ने सीबीआई द्वारा समाचार पत्रों की कटिंग समेत जो सबूत पेश किए थे, उन्हें अनुचित बताया। भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र में, एक आरोपी जब तक निर्दोष रहता है, जब तक उसके खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं हो जाते। यह सीबीआई का काम था कि उसे वे सबूत लाने थे, जिससे यह आपराधिक साजिश सिद्ध होता। लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके, क्योंकि उनके पास साजिश के आरोप को सही ठहराने के लिए कोई सबूत नहीं थे।

कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि सीबीआई ने मौजूदा केंद्र सरकार के दबाव में केस में पक्षपात किया, उन्हें ये समझना होगा कि इस मामले में सीबीआई द्वारा 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार आने से पहले ही सभी सबूत पेश किए थे। 
 
आडवाणी जी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह जैसे नेताओं को जब से इस आपराधिक साजिश के मामले में घसीटा गया, तब से इन सभी को आरोपों के साथ जीना पड़ा। यह मामला नेताओं और कानून के मामलों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच के अंतर को भी उजागर करता है।

'कांग्रेस ने कई मामलों में किए आरोपियों का बचाव'
बीजेपी का दृढ़ होकर कानून की प्रक्रिया में विश्वास करती है और 1999 से 2004 तक अटलजी की सरकार होने के बावजूद, कभी भी सीबीआई के मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया या ना ही इस केस को वापस लेने का कोई प्रयास किया गया। जबकि यह कांग्रेस और उसके आचरण के विपरीत है। कांग्रेस ने कई बोफोर्स से लेकर भोपाल गैस त्रासदी के एंडरसन और 2 जी घोटाले तक कई आरोपियों और परिवारिक मित्रों को कानून से बचाने में मदद की। 
 
कांग्रेस सरकार ने वास्तव में दुखद विध्वंस की जांच के लिए कभी प्रयास ही नहीं किया। इसके अलावा कांग्रेस का एक मात्र उद्देश्य था कि इन भाजपा नेताओं पर संदिग्ध सबूतों के आधार पर जल्द से जल्द झूठे आपराधिक षड्यंत्र का मामला दर्ज कराया जाए। कांग्रेस ने यह सब भाजपा के नेताओं को षड्यंत्र में फंसाकर उसके उदय को रोकने, मुस्लिमों को डराकर विभाजनकारी राजनीति को जारी रखने के लिए किया। 

हां, 3 दशक पहले एक आपराधिक साजिश जरूर रची गई थी, यह सच को सामने आने के बजाय, कांग्रेस के वंशवाद और नेतृत्व की आपराधिक साजिश थी। इसके द्वारा  हिंसक तत्वों को भारत में कई सालों तक हिंसा और आतंकवाद को फैलने का अवसर दिया गया। अब समय है कि कांग्रेस और अन्य दलों की विभाजनकारी राजनीति को रोका जाए और एक एक मजबूत संयुक्त भारत के निर्माण के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जाए।

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