
नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) की मां हीराबेन (Heeraben) का आज 100वां जन्मदिन है। इस मौके पीएम मोदी मां से मिलने के लिए भी पहुंचे। उन्होंने मां हीराबेन से जुड़ी यादों को लेकर एक ब्लाग भी लिखा है। जिसमें कई सारी बातों का जिक्र किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी मां की उन अच्छी यादों के बारे में लिखा है,जिनसे वे जीवनभर प्रेरणा लेते रहे हैं। आइए आप भी जानें पीएम मोदी की मां हीरा बा की कुछ अच्छी आदतें...
जीवों पर दया करना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लिखते हैं कि मेरी मां की एक और आदत रही है जो मुझे हमेशा याद रही। जीव पर दया करना उनके संस्कारों में झलकता रहा। गर्मी के दिनों में पक्षियों के लिए वे मिट्टी के बर्तनों में दाना-पानी जरूर रखा करती थीं। हमारे घर के आसपास जो स्ट्रीट डाग्स रहते थे, वे भूखे ना रहें, मां इसका भी खयाल रखती थीं।
गौ माता को रोटी खिलाना
पीएम कहते हैं कि मां हर रोज, नियम से गौ माता को रोटी खिलाती थीं। लेकिन वह रोटी सूखी नहीं होती, वे हमेशा उस पर घी लगाकर ही देती थीं। पिताजी चाय की दुकान से जो मलाई लाते थे, मां उससे बड़ा अच्छा घी बनाती थीं। उस घी पर सिर्फ हमारा ही अधिकार नहीं था बल्कि मोहल्ले की गायों का भी अधिकार था।
अन्न का एक भी दाना बर्बाद नहीं
पीएम मोदी बताते हैं कि भोजन को लेकर मां का हमेशा ये भी आग्रह रहा है कि अन्न का एक भी दाना बर्बाद नहीं होना चाहिए। हमारे कस्बे में जब किसी के यहां शादी-ब्याह में सामूहिक भोज का आयोजन होता था तो वहां जाने से पहले मां सभी को ये बात जरूर याद दिलाती थीं कि खाना खाते समय अन्न बर्बाद करना। घर में भी उन्होंने यही नियम बनाया हुआ था कि उतना ही खाना थाली में लो जितनी भूख हो।
दूसरों की खुशी में अपनी खुशी
पीएम बताते हैं कि मां हमेशा दूसरों को खुश देखकर खुश रहा करती हैं। घर में जगह भले कम हो लेकिन उनका दिल बहुत बड़ा है। पीएम लिखते हैं कि हमारे घर से थोड़ी दूरी पर एक गांव थी जिसमें मेरे पिताजी के बहुत करीबी दोस्त रहते थे। उनका बेटा था अब्बास। दोस्त की असमय मृत्यु होने पर पिताजी अब्बास को घर ले आए। एक तरह से अब्बास हमारे ही घर रहकर पढ़ा। ईद पर मां अब्बास के लिए उसके पसंद के पकवान बनाती थीं।
सेवाभाव से परिपूर्ण हैं मां
पीएम नरेंद्र मोदी कहते हैं कि हमारे घर के आसपास जब भी कोई साधु-संत आते थे तो मां उन्हें घर बुलाकर भोजन जरूर कराती थीं। जब वे जाने लगते, तो मां अपने लिए नहीं बल्कि हम भाई-बहनों के लिए आशीर्वाद मांगती थीं। उनसे कहती थीं कि मेरी संतानों को आशीर्वाद दीजिए कि वो दूसरों के सुख में सुख देखें और दूसरों के दुख से दुखी हों। मेरे बच्चों में भक्ति और सेवाभाव पैदा हो उन्हें ऐसा आशीर्वाद दीजिए।
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