काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर 15 अक्टूबर को अगली सुनवाई, जानें क्या है पूरा विवाद

Published : Oct 13, 2020, 05:13 PM ISTUpdated : Oct 13, 2020, 06:22 PM IST
काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर 15 अक्टूबर को अगली सुनवाई, जानें क्या है पूरा विवाद

सार

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का काम शुरू होने के साथ ही काशी में विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद की चर्चा फिर से तेज हो गई है। इस मामले में जिला कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई और 15 अक्टूबर को अगली तारीख दी गई है। सुनवाई में तय किया जाएगा कि यह मामला सिविल कोर्ट में चलेगा या वक्फ ट्रिब्यूनल लखनऊ में। ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद क्या है?

नई दिल्ली/लखनऊ. अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का काम शुरू होने के साथ ही काशी में विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद की चर्चा फिर से तेज हो गई है। इस मामले में जिला कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई और 15 अक्टूबर को अगली तारीख दी गई है। सुनवाई में तय किया जाएगा कि यह मामला सिविल कोर्ट में चलेगा या वक्फ ट्रिब्यूनल लखनऊ में। ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद क्या है? 

काशी विश्ननाथ मंदिर का इतिहास
काशी विश्ननाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद  विवाद काफी पुराना है, लेकिन यहां पर अयोध्या की तरह विवाद नहीं है। इतिहासकारों के मुताबिक, ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण औरंगजेब ने करवाया था। यह निर्माण मंदिर तोड़कर किया गया था। औरंगजेब से पहले भी काशी विश्वनाथ मंदिर कई बार टूटा और बनाया गया। लेकिन साल 1669 में औरंगजबे ने इसे तोड़कर वहां ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी। फिर मंदिर को बनाने के लिए काफी कोशिश की गई। 1780 में अहिल्या बाई होलकर ने मस्जिद के पास एक मंदिर का निर्माण करवाया और आज यही काशी विश्वनाथ मंदिर कहलाता है। 

तो फिर विवाद किस बात पर है?
कोर्ट में चल रहा मुकदमा वाद संख्या 610 सन 1991 है। यह प्राचीन मूर्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर व अन्य बनाम अंजुमन इतंजामिया मसाजिद व अन्य है। 1991 में यह मुकदमा काशी के तीन लोगों पंडित सोमनाथ व्यास, पंडित रामरंग शर्मा और हरिहर पांडेय ने दाखिल किया। इन तीनों के अलावा चौथे वादी स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर हैं। दूसरी तरफ अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव और प्रवक्ता एसएम यासीन हैं। 

वरशिप एक्ट के इर्द-गिर्द घूमती है विवाद की सुई
यह विवाद 1991 में लागू हुए कानून प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट के इर्द-गिर्द घूमता है। प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट के मुताबिक, 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस संप्रदाय का था वो आज और भविष्य में भी उसी का रहेगा। इसका मतलब है कि अगर आजादी के दिन एक जगह पर मन्दिर था तो उसपर मुस्लिम दावा नहीं कर सकता। चाहे आजादी से पहले वहां मस्जिद ही क्यूं न रहा हो। ठीक ऐसे ही 15 अगस्त 1947 को एक जगह पर मस्जिद था तो वहां पर आज भी मस्जिद की ही दावेदारी मानी जाएगी। इस कानून से अयोध्या विवाद को अलग रखा गया था।

हिंदू और मुस्लिम पक्ष का क्या कहना है?
इस कानून को लेकर हिंदू पक्ष के वकील विजय शंकर रस्तोगी कहते हैं कि अगर 1991 के कानून को बदला न भी जाए। उसी के हिसाब से चलें तो यह तो तय करना ही होगा कि 15 अगस्त 1947 के दिन उस जगह पर मंदिर थी या मस्जिद। हमारा कहना है कि उस जगह हमेशा मंदिर  ही रहा है। इसकी जांच के लिए पुरातात्विक सर्वेक्षण करवा लिया जाए। वहीं मुस्लिम पक्ष वरशिप एक्ट का हवाला देकर कहता है कि वहां 1947 के वक्त मस्जिद थी। इसलिए उसे वहीं पर रहने देना चाहिए।   

PREV

National News (नेशनल न्यूज़) - Get latest India News (राष्ट्रीय समाचार) and breaking Hindi News headlines from India on Asianet News Hindi.

Recommended Stories

कंधे पर कुदाल-माथे पर गमछा..चेहरे पर मुस्कान, मनरेगा बचाओ में राहुल-खड़गे का देसी लुक
22 जनवरी की 5 बड़ी खबरें: जम्मू में पलटी सेना की गाड़ी, सोना-चांदी सस्ते