
नई दिल्ली. निर्भया के दोषियों को अलग-अलग फांसी देने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी। जिस पर हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा, जिन गुनहगारों की दया याचिका खारिज हो चुकी है, उन्हें तुरंत फांसी दी जाए। केंद्र ने कहा कि गुनहगारों ने फांसी को टालने के लिए हर पैंतरा आजमाया है। इससे देश और समाज में लगातार गलत संदेश जा रहा है। हैदराबाद में गैंगरेप के आरोपियों को एनकाउंटर में मारा गया तो देश के लोगों ने उसे सेलिब्रेट किया। यह सब दिखाता है कि सिस्टम से लोगों का विश्वास उठ रहा है।
कोर्ट ने कहा कि सिस्टम गुनहगारों को समय पर सजा देने में विफल हो रहा है। इस तरह का संदेश जाना सही नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने निर्भया के दोषियों को अलग-अलग फांसी देने की वकालत करते हुए यह दलील दी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है।
केंद्र सरकार की दलील, कोर्ट का जवाब
तुषार मेहता: हाई कोर्ट ने पवन को अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करने के लिए 11 फरवरी तक का वक्त दिया था। उसकी तरफ से ना तो क्यूरेटिव और ना ही मर्सी पिटिशन दाखिल की गई है। इस मामले में कानून तय करना जरूरी है। हाई कोर्ट ने फैसले में कहा था कि सभी मुजरिमों को एक साथ फांसी पर लटकाया जाएगा, लेकिन हमारी दलील है कि अलग-अलग फांसी पर इन्हें लटकाया जा सकता है। हाई कोर्ट के आदेश पर स्टे होना चाहिए।
जस्टिस अशोक भूषण: लेकिन अर्जी अगर दाखिल नहीं है तो डेथ वॉरंट जारी हो सकता है। सरकार चाहे तो निचली अदालत में गुहार लगाकर डेथ वॉरंट जारी कर फांसी की तारीख तय करने के लिए कह सकती है। इसके लिए कोई रोक नहीं है। आप ट्रायल कोर्ट जाएं। अगर कोई मुजरिम (पवन) मर्सी पिटिशन दाखिल नहीं करता, तो उसे मर्सी पिटिशन दाखिल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। एक की अर्जी पेंडिंग नहीं है, बाकी की अर्जी खारिज हो चुकी हैं। ऐसे में आप चाहें तो फांसी की नई तारीख के लिए गुहार लगा सकते हैं।
तुषार मेहता: लेकिन हाई कोर्ट ने आदेश में कहा है कि एक साथ ही फांसी होनी चाहिए। जबकि जेल नियम यह कहता है कि अगर कोई अर्जी या आवेदन पेंडिंग हो तो किसी को फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सकता है। यहां आवेदन से मतलब दया याचिका से नहीं है, बल्कि आवेदन का मतलब एसएलपी जो सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होती है, उससे है। 2017 में ही सभी की एसएलपी खारिज हो चुकी है। ऐसे में अगर एक ने मर्सी पिटिशन दाखिल भी कर दी तो भी बाकी को फांसी हो सकती है।
जस्टिस अशोक भूषण: अगर आप अर्जी दाखिल करेंगे तो उसमें कोई रोक नहीं है, क्योंकि किसी की अर्जी अभी पेंडिंग नहीं है।
तुषार मेहता: लेकिन मुश्किल यह है कि जैसे ही डेथ वॉरंट जारी कर फांसी की तारीख तय होगी अर्जी दाखिल हो जाएगी और फांसी फिर रुक जाएगी। मर्सी पिटिशन व्यक्तिगत होता है। इसका साथ में सजा होने का मतलब नहीं है। ऐसे में बाकी की फांसी क्यों रोकी जाए। हम चाहते हैं कि इस मामले में सुनवाई हो। हमारी दलील है कि हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई जाए, जिसमें साथ फांसी देने का ऑर्डर है। अलग-अलग फांसी देने को लेकर नियम तय होना जरूरी है।
जस्टिस अशोक भूषण: इसके लिए हमें सभी को नोटिस जारी करना होगा और मामले में देरी होगी। ऐसी स्थिति में हम नियम की व्याख्या करेंगे और फिर उसमें समय लगेगा।
तुषार मेहता: हम चाहते हैं कि आप इसको लेकर व्यवस्था तय करें, क्योंकि एक की मर्सी पिटिशन पेंडिंग रहने से दूसरे की फांसी नहीं रुकनी चाहिए। हाई कोर्ट ने नियम की सही व्याख्या नहीं की है। पवन को 7 दिन का वक्त हाई कोर्ट ने दिया है। लेकिन पवन तिकड़म कर रहा है और इसी कारण उसने अर्जी दाखिल नहीं की है। जब फिर से फांसी की तारीख तय होगी तो वह फिर से अर्जी दाखिल करेगा और फांसी पर रोक लग जाएगी। देश में इस तरह से क्या मैसेज जा रहा है। हमारा सिस्टम फेल हो रहा है। मैं हैदराबाद के एनकाउंटर को सही नहीं ठहरा रहा, लेकिन गैंगरेप और मर्डर के आरोपियों के एनकाउंटर के बाद देश में जश्न मनाया गया। यह दिखाता है कि लोगों का इस सिस्टम से विश्वास उठ रहा है।
जस्टिस अशोक भूषण: लेकिन अगर इस मामले में नोटिस जारी कर सुनवाई की गई तो मामला लंबा चलेगा। बेहतर होगा कि आप ट्रायल कोर्ट जाएं और अर्जी दाखिल कर फांसी की तारीख तय करने की गुहार लगाएं।
तुषार मेहता: लेकिन तब तक बाकी को फांसी पर चढ़ाने की इजाजत दी जाए।
जस्टिस अशोक भूषण: यह आदेश हम नहीं दे सकते। यह तो नियम की व्याख्या का विषय है। हम किसी को बाध्य नहीं कर सकते कि मर्सी पिटिशन दाखिल करें। हम हाई कोर्ट के आदेश पर स्टे नहीं करेंगे।
तुषार मेहता: पवन को 7 दिनों का वक्त दिया गया था जो मंगलवार को खत्म हो रहा है।
जस्टिस अशोक भूषण: केंद्र सरकार की अर्जी पर हम चारों मुजरिमों को नोटिस जारी करते हैं और 13 फरवरी को सुनवाई करेंगे। इस दौरान हम केंद्र सरकार की गुहार पर उसे इस बात की लिबर्टी देते हैं कि चूंकि मामले में कोई अर्जी दाखिल नहीं हुई है, ऐसे में वह नए सिरे से फांसी की तारीख तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट में गुहार लगा सकती है। सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग केस का ट्रायल कोर्ट की कानूनी प्रक्रिया पर असर नहीं होगा।
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