इसरो चीफ के. सिवन की कहानी: कॉलेज में दाखिले तक पहनने को चप्पल नहीं थी, पढ़ाई के लिए पिता ने बेच दी थी जमीन

Published : Sep 07, 2019, 04:40 PM IST
इसरो चीफ के. सिवन की कहानी: कॉलेज में दाखिले तक पहनने को चप्पल नहीं थी, पढ़ाई के लिए पिता ने बेच दी थी जमीन

सार

चंद्रयान-2 की तरह ही इसरो चीफ के. सिवन की कहानी भी प्रेरणादायक और जोश से भर देने वाली है। कन्याकुमारी में एक किसान के घर में जन्मे के. सिवन ने अपना बचपन पिता के साथ खेतों में काम करते हुए गुजारा। उस समय उनके पैरों में चप्पल तक नहीं होती थी।

बेंगलुरु.  चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम के साथ संपर्क टूटने के बाद भी आज पूरा देश भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों के प्रयासों और कठिन परिश्रम की तारीफ कर कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान इसरो चीफ के. सिवन काफी भावुक हो गए थे। उनकी इस भावुकता के पीछे उनका सालों का प्रयास था, जिसके बल पर वे चंद्रयान-2 मिशन को इतने आगे तक ले जाने में कामयाब हुए। 

चंद्रयान-2 की तरह ही इसरो चीफ के. सिवन की कहानी भी प्रेरणादायक और जोश से भर देने वाली है। कन्याकुमारी में एक किसान के घर में जन्मे के. सिवन ने अपना बचपन पिता के साथ खेतों में काम करते हुए गुजारा। उस समय उनके पैरों में चप्पल तक नहीं होती थी।

डॉ. सिवन ने बताया था, मैं स्कूल से लौटकर पिता के साथ खेतों में काम करता था। पिता सीजन में आम का भी व्यापार करते थे। छुट्टियों के वक्त मैं आम के बाग में पिता की मदद करने के लिए जाता था। जब मैं वहां होता था, तो पिता खेत में मजदूर भी नहीं रखते थे। कॉलेज के समय में भी मैं अपने पिता की खेतों में मदद करता था। 

उन्होंने बताया, आमतौर पर लोग कॉलेज खोजने में अलग-अलग मापदंड तय करते हैं, लेकिन मेरे पिता का मापदंड था कि जो कॉलेज घर के पास होगा उसमें मेरा दाखिला हो, जिससे मैं जल्द लौटकर खेतों में काम में मदद करूं।

सिवन पर पहनने के लिए पैंट भी नहीं थे
सिवन बताते हैं कि जब उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पढ़ना शुरू किया, तब उन्होंने चप्पल पहननी शुरू की। उस वक्त तक वे सिर्फ नंगे पैर ही रहते थे। उनके पास पहनने के लिए पैंट भी नहीं थे, वे धोती पहनते थे। हालांकि, वे अपने माता-पिता को धन्यवाद देते हैं कि उन्हें आसानी से खाना मिल जाता था। 

 वे बताते हैं कि उन्होंने बैचलर ऑफ साइंस (बीएससी) की क्योंकि उनके पिता उस वक्त इंजीनियरिंग की फीस देने में सक्षम नहीं थे। सिवन ने बताया, वे इंजीनियरिंग करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने कहा कि बीएससी करो। उन्होंने इसका विरोध भी किया। इसके लिए वे एक हफ्ते तक भूखे भी रहे। लेकिन उनके पिता नहीं माने। आखिरकार उन्हें अपना मन बदलना पड़ा। उन्होंने बीएससी में दाखिला ले लिया। 

बीएससी करने के बाद उनके पिता ने कहा कि मैंने एक बार तुम्हें रोका है, इस बार नहीं रोकूंगा, तुम इंजीनियरिंग करो। वे फीस के लिए अपनी खेती बेचने के लिए तैयार हो गए। 
    
सिवन का इसरो चीफ बनने का सफर
- के. सिवन ने अपनी स्कूली शिक्षा एक सरकारी तमिल स्कूल से पूरी की। एस.टी हिन्दू कॉलेज से स्नातक की डिग्री लेने के बाद सिवन ने साल 1980 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया।
- सिवन ने 1982 में बेंगलुरु के आईआईएससी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई पूरी की। सिवन ने साल 2006 में आईआईटी बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में पीएचडी पूरी की।
- सिवन ने साल 1982 में इसरो में काम करना शुरू किया। यहां सिवन ने पीएसएलवी परियोजना, एंड टू ऐंड मिशन प्लानिंग, मिशन डिजाइन, मिशन इंटीग्रेशन ऐंड ऐनालिसिस में काफी योगदान दिया।
- साल 2018 में सिवन इसरो चीफ बने। इसरो चीफ बनने से पहले सिवन ने एक साथ 104 सैटेलाइट के लॉन्च में भी अहम योगदान दिया था।  
- सिवन को इंडियन नेशनल ऐकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग, एयरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया और सिस्टम्स सोसाइटी ऑफ इंडिया की फैलोशिप मिली हुई है। 
- सिवन को कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। इसमें चेन्नई की सत्यभामा यूनिवर्सिटी से अप्रैल 2014 में मिला डॉक्टर ऑफ साइंस और साल 1999 में मिला श्री हरी ओम आश्रम प्रेरित डॉ विक्रम साराभाई रिसर्च अवॉर्ड शामिल है।

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