महाराष्ट्र पुलिस की FIR में आरोप साबित नहीं...जानिए 10 वजह, सुप्रीम कोर्ट ने अर्नब को क्यों दी जमानत?

Published : Nov 27, 2020, 03:56 PM ISTUpdated : Nov 27, 2020, 04:06 PM IST
महाराष्ट्र पुलिस की FIR में आरोप साबित नहीं...जानिए 10 वजह, सुप्रीम कोर्ट ने अर्नब को क्यों दी जमानत?

सार

सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर को आर्किटेक्ट अन्वय नाइक और उनकी मां की आत्महत्या के मामले में रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को जमानत दी थी। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अर्नब को बेल दिए जाने के मामले में विस्तृत फैसला सामने रखा। 

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर को आर्किटेक्ट अन्वय नाइक और उनकी मां की आत्महत्या के मामले में रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को जमानत दी थी। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने अर्नब को बेल दिए जाने के मामले में विस्तृत फैसला सामने रखा। इसमें कोर्ट ने उन कारणों को भी स्पष्ट किया, जिनके आधार पर अर्नब को जमानत दी गई है। कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर यह कहा है कि महाराष्ट्र पुलिस की FIR में प्रथम दृष्टया पर आरोप साबित नहीं होते। 

जानिए सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

1-  जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा, यह देखा जाना चाहिए कि क्या आरोपी सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है, या क्या आरोपी भाग सकता है। ये सिद्धांत समय के साथ सामने आए हैं। इस मामले में आरोपी के भागने का रिश्क नहीं था।

2- जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा- हमने ह्यूमन लिबर्टी और न्यायालयों की भूमिका पर एक खंड भी जोड़ा है। धारा 482 सीआरपीसी के अन्य प्रावधानों को प्रभावी करने के लिए हाईकोर्ट की शक्तियों को मान्यता देता है।

3- कोर्ट निहित शक्ति को मान्यता देता है लेकिन उसे स्वतंत्रता की रक्षा में मदद करनी चाहिए और स्वतंत्रता की अवधारणा संविधान के ताने-बाने से चलती है। आपराधिक कानून के दुरुपयोग के वक्त हाईकोर्ट को जीवित होना चाहिए।

4-  जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा, अर्नब गोस्वामी ने कहा कि उन्हें उनके विचारों की वजह से अप्रैल 2020 से टारगेट किया जा रहा था। लेकिन यहां HC ने संवैधानिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों के रक्षक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह किया। आपराधिक कानून नागरिकों के लिए चयनात्मक उत्पीड़न के लिए एक उपकरण नहीं बनना चाहिए।

5- मुंबई पुलिस द्वारा दर्ज FIR और आत्महत्या के लिए अपमान के अपराध के बीच कोई संबंध नहीं दिख रहा। ऐसे में अर्नब के खिलाफ आरोप साबित नहीं हो रहे हैं।

6- अदालत के दरवाजे एक ऐसे नागरिकों के लिए बंद नहीं किए जा सकते, जिसके खिलाफ प्रथम दृष्टया राज्य द्वारा अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने के संकेत हों।

7- किसी व्यक्ति को एक दिन के लिए भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करना बहुत ज्यादा है। जमानत अर्जी से निपटने में देरी की संस्थागत समस्याओं को दूर करने के लिए अदालतों की जरूरत है।

8- 2018 के आत्महत्या मामले में जर्नलिस्ट अर्नब गोस्वामी की अंतरिम जमानत तब तक जारी रहेगी, जब तक बॉम्बे हाईकोर्ट उनकी याचिका फैसला नहीं दे देता। अंतरिम जमानत अगले 4 हफ्ते के लिए होगी।

9- अगर अदालत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से सुरक्षा के लिए अपने दरवाजे पर दस्तक देने वाले नागरिक की सहायता नहीं करती है तो यह कोर्ट द्वारा संविधान न्यायालय के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं करना है।

10-  अदालतों के दरवाजे ऐसे मामलों में बंद नहीं किए जा सकते हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित होने के सभी मामलों के लिए अदालतें खुली रहनी चाहिए।

साल 2018 के केस में अर्नब की गिरफ्तारी हुई थी
अर्नब पर एक मां और बेटे को खुदकुशी के लिए उकसाने का आरोप लगा है। मामला 2018 का है। 53 साल के एक इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक और उसकी मां ने आत्महत्या कर ली थी। मामले की जांच सीआईडी की टीम कर रही है। कथित तौर पर अन्वय नाइक के लिखे सुसाइड नोट में कहा गया था कि आरोपियों (अर्नब और दो अन्य) ने उनके 5.40 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं किया था, इसलिए उन्हें आत्महत्या का कदम उठाना पड़ा।

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