सबरीमाला : सुप्रीम कोर्ट ने मामला 7 जजों की बेंच को भेजा, कहा- तब तक पुराना फैसला बना रहेगा

Published : Nov 14, 2019, 09:51 AM ISTUpdated : Nov 14, 2019, 11:58 AM IST
सबरीमाला : सुप्रीम कोर्ट ने मामला 7 जजों की बेंच को भेजा, कहा- तब तक पुराना फैसला बना रहेगा

सार

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इस मामले को बड़ी बेंच को भेज रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि 5 की जगह 7 जजों की बेंच सुनवाई करेगी। पांच जजों की बेंच में से 3-2 से यह फैसला लिया गया। दो जजों की बेंच के बाद भी यह फैसला बड़ी बेंच को भेजा गया।  

नई दिल्ली. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इस मामले को बड़ी बेंच को भेज रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि 5 की जगह 7 जजों की बेंच सुनवाई करेगी। पांच जजों की बेंच में से 3-2 से यह फैसला लिया गया। दो जजों की बेंच के बाद भी यह फैसला बड़ी बेंच को भेजा गया। कोर्ट ने कहा कि 28 सितंबर 2018 को लिए गए सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना रहेगा। 10 साल से लेकर 50 साल की महिलाएं मंदिर में जा सकेंगी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि महिलाओं का पूजा स्थलों में प्रवेश सिर्फ इस मंदिर तक सीमित नहीं है, यह मस्जिदों और पारसी मंदिरों पर भी लागू होता है।

- 10 से 50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की इजाजत सुप्रीम कोर्ट ने दी थी, लेकिन इसी फैसले पर 65 पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई हैं। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा कर रहे हैं। सबरीमाला मंदिर केरल के पठानमथिट्टा जिले में पेरियार टाइगर रिजर्व में है। 

10 हजार जवान तैनात
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले सबरीमाला की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। करीब 10 हजार जवानों को तैनात किया गया है। इसके साथ ही 16 नवंबर से मंडलम मकर विलक्कू उत्सव शुरू हो रहा है। दो महीने तक चलने वाले इस वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए पांच स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था
सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने 4-1 से फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि लिंग के आधार पर किसी को मंदिर में प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकता है। वहीं दूसरी तरफ पीठ की इकलौती महिला सदस्य जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने बहुमत के फैसले का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि धार्मिक मान्यताओं में कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। हिंदू परंपरा में हर मंदिर के अपने नियम होते हैं।

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