
Bhima Koregaon case: सु्प्रीम कोर्ट ने भीमा कोरेगांव हिंसा मामले के दो आरोपियों को जमानत दे दी है। पांच साल से एल्गार परिषद के दोनों सदस्य मुंबई के तलोजा जेल में बंद थे। दोनों आरोपियों वर्नोन गोंसाल्वेस और अरुण फरेरा को आतंकवादी विरोधी यूएपीए कानून के तहत अरेस्ट किया गया था।
भीमा कोरेगांव हिंसा के आरोपियों पर यूएपीए के तहत केस
एल्गार परिषद के सदस्य वर्नोन गोंसाल्वेस और अरुण फरेरा को अगस्त 2018 में भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़काने के आरोप में अरेस्ट किया गया था। इनके खिलाफ आतंकवादी विरोधी कानून यूएपीए के तहत कार्रवाई की गई थी। दोनों आरोपियों की जमानत को दिसंबर 2021 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी। ये लोग मुंबई के तलोजा जेल में बंद थे।
पांच साल से जेल में हिरासत काट रहे एल्गार परिषद के दोनों सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने कहा कि पांच साल से अधिक समय से जेल में ये लोग हैं। हालांकि, उनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं लेकिन जमानत से इनकार करने का केवल यही आधार नहीं हो सकता। मुकदमे के लंबित रहने तक उनकी निरंतर हिरासत को उचित ठहराया जाना भी एकमात्र सही आधार नहीं हो सकता।
क्या है भीमा कोरेगांव हिंसा का मामला?
भीमा कोरेगांव हिंसा की पृष्ठभूमि दो सौ साल पूर्व में हुई ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा पेशवा गुट युद्ध से तैयार होती है। 1 जनवरी 1818 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा पेशवाओं के बीच युद्ध हुआ था। उस समय अछूत माने जाने वाले महार समुदाय के सैनिकों के समर्थन से ईस्ट इंडिया कंपनी को जीत मिली थी और युद्ध में मराठाओं की हार हुई। 1 जनवरी 2018 को पुणे के भीमा कोरेगांव में एल्गार परिषद के बैनर तले इस जीत की 200वीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी। इसी दौरान हिंसा हो गई। इस हिंसा में एक युवक की मौत हुई थी। इस केस में लेफ्टिस्ट वरवर राव, सुधा भारद्वाज, स्टेन स्वामी, वेरनन गोंजाल्वेज, गौतम नवलखा और अरुण फरेरा समेत 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। सभी पर जातीय हिंसा भड़काने का आरोप था। NIA ने इन पर ISI और नक्सलियों से संबंध होने का आरोप भी लगाया था।
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