
नई दिल्ली: धर्मांतरण पर रोक नहीं लगाई गई तो देश में बहुसंख्यक अल्पसंख्यक हो जाएंगे, इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस विवादित टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया है. उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत गिरफ्तार एक व्यक्ति को जमानत देने से इनकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह विवादित टिप्पणी की थी. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस टिप्पणी को हटा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां किसी भी मामले में नहीं की जानी चाहिए और जमानत याचिका पर विचार करते समय इस तरह की टिप्पणियों का कोई औचित्य नहीं है.
कैलाश नाम के एक व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह विवादित टिप्पणी की थी. कैलाश को ईसाई धर्म अपनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. कोर्ट ने जमानत याचिका भी खारिज कर दी थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रोहित रंजन अग्रवाल ने यह टिप्पणी की थी. कोर्ट ने कहा था कि संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म के प्रचार की स्वतंत्रता देता है, धर्मांतरण की नहीं. कोर्ट ने यह भी कहा था कि उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा है.
कोर्ट ने यह भी कहा था कि गरीबों, पिछड़ों और दलितों का जबरन धर्मांतरण कराया जा रहा है. रामकली प्रजापति नाम के व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी. उसने कैलाश पर आरोप लगाया था कि उसने उसके दिव्यांग भाई को इलाज का झांसा देकर धर्म परिवर्तन कराया. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वह गांव के कई लोगों को दिल्ली ले गया और उनका धर्मांतरण करा दिया. मामला हमीरपुर जिले के मौदहा थाने में दर्ज किया गया था.
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