
नई दिल्लीः केंद्र सरकार ने तीन तलाक को खत्म किया था जो मुस्लिम महिलाओं के लिए एक अभिशाप था और सुप्रीम कोर्ट ने इसे बरकरार रखा, यह तो अब पुरानी बात हो गई है। अब मुस्लिम महिलाओं के हक में एक और ऐतिहासिक फैसला आया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत, शादी के समय अपने पिता से मिले कैश और सोने के गहने वापस पाने की हकदार है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस कानून का दायरा काफी बड़ा है। यह तलाक के बाद मुस्लिम महिला की गरिमा और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत महिलाओं के अधिकारों के अनुरूप है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह दुख की बात है कि कुछ समुदायों में आज भी पितृसत्ता हावी है। मुस्लिम महिलाओं के लिए बने कानून की संरचना में समानता, गरिमा और स्वायत्तता को सबसे आगे रखना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में मौजूद पितृसत्तात्मक भेदभाव को खत्म करने की जरूरत है।
इस मामले में, एक जोड़े ने 28 अगस्त, 2005 को शादी की और 13 दिसंबर, 2011 को उनका तलाक हो गया। इसके बाद, बेगम ने दहेज की रकम, सोने के गहने और अन्य सामान समेत 17,67,980 रुपये की वापसी के लिए मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह मामला बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन हाईकोर्ट ने महिला के खिलाफ फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने काजी (मैरिज रजिस्ट्रार) और महिला के पिता के बयानों में विरोधाभास को देखते हुए यह फैसला दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि पति को दी गई रकम और सोने को दर्ज करने में गलती होने की वजह से महिला के पक्ष में फैसला देना संभव नहीं है। इसके खिलाफ बेगम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने दलीलें सुनने के बाद महिला के हक में फैसला सुनाया है। साथ ही, यह भी कहा है कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला शादी के समय अपने पिता से मिले कैश और सोने के गहने वापस पाने की हकदार है।
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