
देहरादून. उत्तराखंड में चमोली में ग्लेशियर टूटने से 179 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं। वहीं, अब तक 58 शव मिल चुके हैं। लेकिन अब चमोली त्रासदी ने उत्तराखंड और गंगा नदी में परमाणु विकिरण की गंभीर चिंता भी पैदा कर दी है। उधर, इस घटना की वजह का पता लगाने के लिए उत्तराखंड सरकार ने एक विभाग बनाया है। वहीं, केंद्र सरकार से भी मांग की जाएगी कि उस रडार सिस्टम का पता लगाया जाए, जिसे चीन की निगरानी के लिए हिमालय की पहाड़ी पर रखा गया था।
दरअसल, 1965 में उत्तराखंड में नंदा देवी पर्वत के शिखर रडार सिस्टम स्थापित करने के दौरान एक प्लूटोनियम पैक खो गया था। यह आज तक नहीं मिला है। वहीं, ऐसे में माना जा रहा कि प्लूटोनियम पैक की वजह तो कहीं ग्लेशियर नहीं टूटा।
क्या है मामला?
दरअसल, राज्य के सिंचाई मंत्री सतपाल महाराज ने सोमवार को कहा कि एक विभाग बनाया जाएगा जो ग्लेशियर्स की सैटेलाइट से निगरानी और अध्ययन करेगा। माना जा रहा है कि अगर ग्लेशियर प्लूटोनियम में हुए विस्फोट की वजह से टूटा है तो उत्तराखंड और खासतौर पर गंगा नदी में खतरनाक रेडिएशन भी फैल सकता है।
क्या है प्लूटोनियम पैक का मामला?
चीन ने 1964 में परमाणु परीक्षण किया था। इसके बाद 1965 में अमेरिका ने भारत के साथ मिलकर चीन पर नजर रखने के लिए एक करार किया था। इसके तहत हिमालय में नंदा देवी पर एक रडार लगाया जाना था। इसमें परमाणु ऊर्जा से चलने वाला जनरेटर लगा था। इसमें प्लूटोनियम के कैप्सूल थे। लेकिन जब ये मशीनें पहाड़ पर ले जाई जा रही थीं, तभी मौसम खराब हो गया। टीम को लौटना पड़ा। मशीनें वहीं रह गईं। इसके बाद ग्लेशियर में कहीं खो गईं।
बाद में अमेरिका ने यहां दूसरा सिस्टम लगाया। अब माना जा रहा है कि चमोली में ग्लेशियर कहीं इसी प्लूटोनियम की वजह से नहीं टूटा।
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