
Janmashtami 2026 Puja Muhurat: श्रीमद्भागवत के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इसी वजह से इस दिन देशभर में जन्माष्टमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा करते हैं। मान्यता है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विधि-विधान से व्रत किया जाए तो व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी हो सकती है। आगे जानिए कैसे करें जन्माष्टमी व्रत, शुभ मुहूर्त और मंत्र आदि की डिटेल…
जन्माष्टमी पर वैसे तो पूरे दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कर सकते हैं लेकिन रात में पूजन का विशेष महत्व है। इस बार रात्रि में पूजा का शुभ मुहूर्त रात 11 बजकर 57 मिनिट से 12 बजकर 43 मिनिट तक रहेगा यानी भक्तों को पूजा के लिए 45 मिनिट का समय मिलेगा।
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- जन्माष्टमी से एक दिन पहले यानी 3 सितंबर की शाम को सात्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। अगर संभव हो तो जमीन पर सोएं।
- अगले दिन यानी 4 सितंबर की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद हाथ में जल और चावल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- दिन भर व्रत के नियमों का पालन करें यानी किस पर क्रोध न करें, किसी को अपशब्द न कहें। गलत विचार मन में न लाएं। मन में श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप करें।
- घर में पूजा के लिए स्थान तय कर उसे गंगा जल से पवित्र कर लें। रात को पूजा से पहले जरूरी सभी सामग्री पहले से एक जगह तैयार करके रख लें।
- भगवान श्रीकृष्ण के लिए सुंदर पालना सजाएं। इसमें लड्डू गोपाल की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। शुभ मुहूर्त शुरू होने पर पूजा शुरू करें।
- कान्हा को तिलक लगाएं, फूल अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं। इसके बाद अबीर, गुलाल, इत्र, नारियल, फल और अन्य पूजा सामग्री भगवान को चढ़ाएं।
- पूजा के दौरान ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का जाप करते रहें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगाएं। भोग में तुलसी की पत्ती जरूर रखें।
- परिवार के साथ मिलकर भगवान की आरती करें। थोड़ी देर भगवान श्रीकृष्ण को झूला झूलाएं। संभव हो तो रात में परिवार के साथ भजन कीर्तन भी करें।
- जन्माष्टमी व्रत का पारण अपनी परंपरा और मान्यताओं के अनुसार अगले दिन करें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करके भोजन किया जा सकता है।
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आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै;
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा;
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरन छवि श्रीबनवारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू;
हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद;
टेर सुन दीन भिखारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
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