Dussehra 2025: कहीं होती रावण की पूजा-कहीं मारते गोली, अजीब हैं दशहरे की ये 5 परंपराएं

Published : Oct 02, 2025, 11:46 AM IST

Dussehra 2025: दशहरे से जुड़ी कईं ऐसी परंपराएं हैं जो बहुत ही रोचक हैं जैसे कहीं रावण की पूजा की जाती है तो कहीं गोली मारी जाती है। जानें दशहरे से जुड़ी कुछ ऐसी ही परंपराओं के बारे में।

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जानें दशहरे की 5 रोचक परंपराओं के बारे में

Dussehra Ki Anokhi Parmparaye: हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर दशहरा पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 2 अक्टूबर, गुरुवार को है। इस दिन पूरे देश में रावण के पुतलों का दहन करने की परंपरा है। इस दिन से जुड़ी कुछ रोचक परंपराएं हैं भी जो इस त्योहार को और भी खास बना देती हैं, जैसे दशहरे पर कहीं रावण की पूजा की जाती है तो कहीं गोली मारी जाती है। आगे जानिए दशहरे से जुड़ी कुछ ऐसी ही रोचक परंपराओं के बारे में…

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कहां होती है रावण की पूजा?

राजस्थान के संगोला गांव में दशहरे के मौके पर रावण के पुतलों का दहन नहीं किया जाता बल्कि इसकी पूजा की जाती है। यहां काले पत्थर से बनी रावण की एक विशाल और प्राचीन प्रतिमा है। इस परंपरा की शुरूआत कैसे हुई, इसके बारे में कोई नहीं जानता, लेकिन हर इस दशहरे के मौके पर पूरे गांव के लोग इकट्ठे होकर रावण की पूजा जरूर करते हैं।

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कहां मारते हैं रावण के पुतले को गोली?

रावण के पुतलों के दहन के बारे में तो आपने सुना होगा लेकिन इसे गोली मारने की परंपरा बहुत अजीब और रोचक है। ये परंपरा राजस्थान के उयदपुरवटी में दादू दयाल समाज के लोगों द्वारा निभाई जाती है। समाज के लोग दशहरे पर रावण के पुतले का दहन नहीं करते बल्कि गोली मारते हैं। ये परंपरा लगभग 125 साल पुरानी बताई जाती है।

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कहां होता है महिषासुर के पुतले का दहन?

दशहरे पर रावण के पुतले का दहन तो पूरे देश में किया जाता है लेकिन इस दिन महिषासुर के पुतले का दहन की परंपरा राजस्थान के पुष्कर के विजयनगर में निभाई जाती है। महिषासुर के पुतले का दहन शक्तिपीठ बाड़ी मंदिर में होता है। कहते हैं कि विजयादशमी के मौके पर ही देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया जाता है। इसलिए देवी का एक नाम महिषासुर मर्दिनी भी है।

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कहां निकालते हैं रावण का शवयात्रा?

रावण के पुतले की शवयात्रा, सुनने में ये बात थोड़ी अजीब जरूर लगे लेकिन दशहरे के मौके पर राजस्थान के भीलवाड़ा में रावण का पुतलों का दहन नहीं करते बल्कि उसके पुतले की शवयात्रा निकालते हैं। ये शवयात्रा शहर के मुख्य मार्गों से निकाली जाती है और श्मशान पर जाकर खत्म होती है। यहां रावण के पुतले का दहन किया जाता है। ये परंपरा करीब 50 साल पुरानी बताई जाती है।

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कहां मनाते हैं रावण की मृत्यु का शोक?

देश में एक जगह ऐसी भी है जहां रावण की मृत्यु का शोक मनाया जाता है। ये स्थान है राजस्थान के जोधपुर जिला का मंडोर गांव। स्थानीय मान्यता के अनुसार रावण की पत्नी मंदोदरी इसी गांव की थी, इसलिए यहां को लोग रावण को अपना दामाद मानते हैं और उसकी मृत्यु का शोक मनाते हैं। ये परंपरा भी काफी पुरानी है।

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