
FIFA World Cup 2026 Update: क्या वे कोई अपराधी हैं जो उनके साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है? आज पूरी फुटबॉल की दुनिया यही सवाल पूछ रही है। ये सवाल डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन और जियानी इनफैंटिनो की अगुवाई वाले फीफा से है। अमेरिका की मेज़बानी में हो रहे फीफा वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने के लिए सेनेगल की नेशनल टीम सैन एंटोनियो पहुंची। अमेरिकी धरती पर कदम रखते ही रनवे पर ही सुरक्षा अधिकारियों ने उन्हें घेर लिया। एक कुर्सी पर बिठाकर उनके बालों से लेकर नाखून तक की जांच की गई, यहां तक कि उनके जूते भी अच्छी तरह से चेक किए गए।
वहीं, उज्बेकिस्तान की टीम का स्वागत तो नशीले पदार्थ खोजने वाले डॉग स्क्वॉड और मेटल डिटेक्टर से किया गया। मतलब सिर्फ उनके रंग और देश के नाम पर आज भी उन पर शक किया जा रहा है। और ये वो लोग हैं जो दुनिया के सबसे बड़े मंच पर फुटबॉल खेलने आए हैं। सोचने वाली बात है कि क्या किसी यूरोपीय देश के खिलाड़ियों के साथ कभी ऐसा हुआ है?
पहले फैन्स, फिर पत्रकार, टीम के अधिकारी, खिलाड़ी और अब तो रेफरी तक, भेदभाव झेलने वालों की लिस्ट लंबी होती जा रही है। दुनिया में शांति, रंगभेद और नस्लवाद के खिलाफ लगातार बोलने वाले इनफैंटिनो और फीफा, ट्रंप प्रशासन की इन हरकतों पर पूरी तरह चुप हैं।
याद दिला दें कि 2017 में, जब ट्रंप पहली बार सत्ता में आए थे, तो उन्होंने छह मुस्लिम-बहुल देशों पर ट्रैवल बैन लगा दिया था। तब इनफैंटिनो ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था, "फीफा टूर्नामेंट के लिए क्वालिफाई करने वाली किसी भी टीम, उनके स्टाफ और फैन्स को मेजबान देश में एंट्री देनी ही होगी। अगर ऐसा नहीं होता है, तो उस देश को वर्ल्ड कप की मेज़बानी नहीं मिलेगी।" यह ट्रंप के लिए एक सीधी चेतावनी थी।
लेकिन 2026 आते-आते, जब ट्रंप प्रशासन ने इमिग्रेशन नीतियां और सख्त कर दी हैं और वर्ल्ड कप की चमक फीकी पड़ रही है, तो फीफा के लिए ट्रंप 'शांति के दूत' बन गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका के कड़े नियमों के चलते हैती, ईरान, सेनेगल और आइवरी कोस्ट जैसे देशों के फैन्स को या तो आंशिक या पूरी तरह से ट्रैवल बैन का सामना करना पड़ रहा है।
उमर अब्दुल कादिर आर्टन, वर्ल्ड कप को कंट्रोल करने वाले पहले सोमाली रेफरी थे। इतिहास रचने वाले इस शख्स को अमेरिका ने अपनी धरती पर कदम तक नहीं रखने दिया और वापस भेज दिया। इस पर फीफा ने कहा कि वे मेजबान देश की इमिग्रेशन पॉलिसी में दखल नहीं देंगे और किसे एंट्री देनी है, यह तय करने का पूरा अधिकार उसी देश का है।
एक तरफ इनफैंटिनो इसे 'मानव जाति का सबसे बड़ा खेल उत्सव' बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमानवीय घटनाएं हो रही हैं। 2017 में इनफैंटिनो की चेतावनी एक मज़ाक बनकर रह गई है। ईरान की टीम के 15 अधिकारियों को वीजा नहीं दिया गया, जिसके चलते टीम को अपनी ट्रेनिंग मेक्सिको में शिफ्ट करनी पड़ी। ईरान को मैच से ठीक एक दिन पहले ही अमेरिका आने की इजाजत दी गई है।
इराक के खिलाड़ी अयमान हुसैन, जिन्होंने दशकों बाद अपने देश को वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई कराया, उन्हें शिकागो एयरपोर्ट पर 7 घंटे तक हिरासत में रखा गया। इराकी टीम के फोटोग्राफर तलाल साला को एयरपोर्ट पर 10 घंटे इंतजार कराने के बाद अमेरिका में एंट्री देने से मना कर दिया गया। साउथ अफ्रीकी टीम की जोहान्सबर्ग से फ्लाइट भी वीजा दिक्कतों की वजह से लेट हुई। जब खिलाड़ियों का यह हाल है, तो फैन्स की हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अमेरिका पहुंचे फैन्स का कहना है कि यह वर्ल्ड कप किसी भी तरह से उनके बजट में नहीं है। टिकटों की कीमतें इतिहास में सबसे ज़्यादा हैं, और रहने की व्यवस्था भी बहुत महंगी है। वीजा पाने की मुश्किलें तो और भी ज़्यादा हैं।
वीजा के लिए एक व्यक्ति को 185 अमेरिकी डॉलर यानी करीब 18,000 रुपये देने पड़ रहे हैं। इसके अलावा, एक इंटरव्यू देना होगा और यह गारंटी भी देनी होगी कि वे टूर्नामेंट के बाद वापस लौट जाएंगे। पिछले मई में अमेरिका ने एक और शर्त रखी कि अल्जीरिया, केप वर्दे, आइवरी कोस्ट, सेनेगल और ट्यूनीशिया जैसे क्वालिफाई कर चुके देशों से आने वालों को 15,000 अमेरिकी डॉलर (करीब 15 लाख रुपये) का डिपॉजिट रखना होगा। ये सारी बातें पहली नज़र में ही बेहद गलत लगती हैं।
इन सबके अलावा एक और बड़ी चिंता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी वर्ल्ड कप पर्यावरण के लिए भी एक बड़ी तबाही साबित होगा। फीफा ने 2030 तक कार्बन उत्सर्जन 50% कम करने और 2040 तक नेट-जीरो का लक्ष्य रखा है। लेकिन तीन देशों में फैला यह लंबा टूर्नामेंट हवाई यात्रा पर बहुत ज़्यादा निर्भर करेगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इससे 90 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड पैदा होने का अनुमान है, जो पिछले चार वर्ल्ड कप के औसत का लगभग दोगुना है। पर्यावरण की चिंताएं, मज़दूर विरोधी और अमानवीय हरकतें... यह सब याद दिलाता है कि वर्ल्ड कप की चकाचौंध के पीछे एक स्याह सच भी है।