
ये बात 1980 की है, जब इटली के फुटबॉल पर एक काला साया मंडरा रहा था। इसे 'टोटोनेरो' यानी मैच फिक्सिंग स्कैंडल के नाम से जाना गया। इस कांड ने इटली के फुटबॉल की साख पर बट्टा लगा दिया था। इस कीचड़ के छींटे एक ऐसे खिलाड़ी पर भी पड़े, जिसका नाम पाओलो रॉसी था। रॉसी को फुटबॉल से दो साल के लिए बैन कर दिया गया। जो फैंस कल तक उनके लिए तालियां बजाते थे, वही उन्हें एक अपराधी की तरह देखने लगे। दो साल तक रॉसी गुमनामी और बदनामी के बोझ तले दबे रहे। जिस खिलाड़ी से इटली को बड़ी उम्मीदें थीं, उसे देशद्रोही तक कहा गया। मीडिया ने भी उन पर खूब सवाल उठाए।
लेकिन यहीं से फुटबॉल इतिहास की सबसे बड़ी वापसी की कहानी शुरू होती है। वो कहानी, जिसमें रॉसी ने अपने ऊपर लगे हर दाग को सोने से धो दिया।
ये वो दौर था जब फुटबॉल रेडियो से निकलकर टीवी स्क्रीन पर छा चुका था। पूरी दुनिया की नजरें स्पेन पर थीं। लेकिन इटली की टीम में उथल-पुथल मची हुई थी, और वजह थे पाओलो रॉसी। जब पूरा देश रॉसी के खिलाफ था, तब सिर्फ एक शख्स को उन पर भरोसा था - इटली के कोच, एंज़ो बेयरज़ोट।
रॉसी शारीरिक और मानसिक रूप से वर्ल्ड कप के लिए तैयार नहीं लग रहे थे। लेकिन कोच बेयरज़ोट को उनकी काबिलियत पर पूरा यकीन था। बॉक्स के अंदर गोल करने की उनकी भूख और बड़े मौकों पर कमाल करने की क्षमता को कोच जानते थे। एक तरह से, रॉसी को टीम में चुनना बेयरज़ोट का एक बड़ा जुआ था।
शुरुआती ग्रुप स्टेज के बाद लगा कि कोच अपना जुआ हार गए हैं। इटली ने अपने तीनों मैच (कैमरून, पेरू और पोलैंड के खिलाफ) ड्रॉ खेले और बस किसी तरह अगले राउंड में पहुंची। रॉसी मैदान पर एक साये की तरह भटक रहे थे। ऐसा लग रहा था कि दो साल का बैन अब भी उन पर हावी है।
दूसरे राउंड में इटली का मुकाबला 'ग्रुप ऑफ डेथ' में था। सामने थीं डिएगो माराडोना की अर्जेंटीना और ज़ीको, सुकरात, फाल्काओ जैसे सितारों से सजी ब्राज़ील की टीम, जिसे उस दौर की सबसे बेहतरीन टीमों में से एक माना जाता था। इटली ने अर्जेंटीना को तो हरा दिया, लेकिन रॉसी का खाता अब भी नहीं खुला था। सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए अब ब्राज़ील को हराना ज़रूरी था।
बार्सिलोना का सारिया स्टेडियम। यहीं पर रॉसी ने अपना असली खेल दिखाया। मैच के पांचवें मिनट में ही एंटोनियो कैब्रिनी के क्रॉस पर रॉसी ने हेडर से गोल कर दिया। 10 इंटरनेशनल मैचों के बाद यह उनका पहला गोल था। हालांकि, कुछ ही देर बाद सुकरात ने ब्राज़ील के लिए बराबरी का गोल दाग दिया। लेकिन उस दिन रॉसी को कोई नहीं रोक सकता था।
उन्होंने ब्राज़ील के डिफेंडर से गेंद छीनकर बॉक्स के बाहर से एक शानदार शॉट मारा और गोल कर दिया। इटली फिर से आगे हो गया। 68वें मिनट में फाल्काओ ने ब्राज़ील को फिर बराबरी पर ला दिया। ड्रॉ से भी ब्राज़ील सेमीफाइनल में पहुंच जाती, लेकिन रॉसी ने 74वें मिनट में अपना तीसरा गोल दागकर हैट्रिक पूरी की और ब्राज़ील का सपना तोड़ दिया।
उस दिन मैदान पर सिर्फ और सिर्फ रॉसी का जादू चला। उन्होंने ब्राज़ील के फैंस को रुला दिया और अपने ऊपर लगे सारे दाग धो दिए। दुनिया की सबसे बेहतरीन ब्राज़ीलियन टीमों में से एक वर्ल्ड कप क्यों नहीं जीत पाई? इसका एक ही जवाब है- पाओलो रॉसी।
रॉसी का ये कमाल यहीं नहीं रुका। सेमीफाइनल में उन्होंने पोलैंड के खिलाफ दो गोल किए और इटली को फाइनल में पहुंचा दिया। सैंटियागो बर्नब्यू में फाइनल वेस्ट जर्मनी के खिलाफ था। 57 मिनट तक कोई गोल नहीं हुआ, फिर रॉसी ने ही पहला गोल दागकर इटली को बढ़त दिलाई। इसके बाद इटली ने दो और गोल किए और 3-1 से मैच जीतकर 44 साल बाद वर्ल्ड कप अपने नाम कर लिया।
जो रॉसी टूर्नामेंट की शुरुआत में गुमनाम थे, वही रॉसी 6 गोल के साथ गोल्डन बूट, गोल्डन बॉल और उसी साल बैलन डी'ओर के विजेता बने। उन्होंने बदनामी के दाग को वर्ल्ड कप की सुनहरी ट्रॉफी से हमेशा के लिए मिटा दिया। ये वो गर्मियां थीं, जब पाओलो रॉसी ने अपना नाम इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज करा लिया।