तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है ये शक्तिपीठ, यहां प्रसाद के रूप में भक्तों को देते हैं गीला कपड़ा

Published : Oct 01, 2019, 03:04 PM IST
तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है ये शक्तिपीठ, यहां प्रसाद के रूप में भक्तों को देते हैं गीला कपड़ा

सार

असम के गुवाहाटी में नीलांचल पर्वत पर स्थित है कामाख्या शक्तिपीठ। मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती का योनि भाग गिरा था। इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है।

उज्जैन. यह पीठ माता के सभी पीठों में से माहापीठ माना जाता है। यह स्थान तंत्र साधना के लिए बहुत प्रसिद्ध है। नवरात्रि के 9 दिनों में यहां तांत्रिकों को जमावड़ा लगता है।

यहां माता हर साल होती हैं रजस्वला
इस जगह पर माता के योनि भाग गिरा था, जिस वजह से यहां पर माता हर साल तीन दिनों के लिए रजस्वला होती हैं। इस दौरान मंदिर को बंद कर दिया जाता है। तीन दिनों के बाद मंदिर को बहुत ही उत्साह के साथ खोला जाता है। यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अम्बुवाची वस्त्र कहते हैं। कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने के दौरान प्रतिमा के आस-पास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है। तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल रंग से भीगा होता है। बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

16वीं शताब्दी से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में कामरूप प्रदेश के राज्यों में युद्ध होने लगे, जिसमें कूचविहार रियासत के राजा विश्वसिंह जीत गए। युद्ध में विश्वसिंह के भाई खो गए थे और अपने भाई को ढूंढने के लिए वे घूमत-घूमते नीलांचल पर्वत पर पहुंच गए। वहां पर उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उस महिला ने राजा को इस जगह के महत्व और यहां कामाख्या पीठ होने के बारे में बताया। यह बात जानकर राजा ने इस जगह की खुदाई शुरु करवाई। खुदाई करने पर कामदेव का बनवाए हुए मूल मंदिर का निचला हिस्सा बाहर निकला। राजा ने उसी मंदिर के ऊपर नया मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि 1564 में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर को तोड़ दिया था। जिसे अगले साल राजा विश्वसिंह के पुत्र नरनारायण ने फिर से बनवाया।

भैरव के दर्शन के बिना अधूरी है कामाख्या की यात्रा
कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है, उमानंद भैरव ही इस शक्तिपीठ के भैरव हैं। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में है। कहा जाता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। कामाख्या मंदिर की यात्रा को पूरा करने के लिए और अपनी सारी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए कामाख्या देवी के बाद उमानंद भैरव के दर्शन करना अनिवार्य है।

कैसे जाएं?
- कामाख्या मंदिर के सबसे नजदीक गुवाहाटी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। एयरपोर्ट से मंदिर की दूरी महज 20 किलोमीटर है। इस एयरपोर्ट के लिए नई दिल्ली, मुंबई और चेन्नई से नियमित फ्लाइट मिल जाती हैं।
- गुवाहाटी रेलवे स्टेशन देश के सभी हिस्सों से कनेक्ट है। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से ऑटो/बस के जरिए मंदिर पहुंचा जा सकता है।
- गुवाहाटी सड़क मार्ग भी देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। निजी वाहन द्वारा भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

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