
नई दिल्ली। चांद पर सबसे पहला कदम अमेरिकी एस्ट्रोनॉट नील आर्मस्ट्रांग ने रखा था। 21 जुलाई, 1969 को उन्होंने पहली बार चांद पर कदम रखा और 2.5 घंटे की स्पेस वॉक की थी। आर्मस्ट्रांग अपोलो 11 अंतरिक्षयान में सवार हुए थे जो 20 जुलाई 1969 को चंद्रमा पर उतरा था। उनके साथ एक अन्य अंतरिक्षयात्री एडविन एल्ड्रिन भी थे। अब यह कहा जा रहा है कि चांद पर उनके कदमों के निशान आज भी मौजूद हैं। वाकई यह एक बेहद चौंकाने वाली बात है।
पृथ्वी का सबसे नजदीकी उपग्रह है चांद
वैज्ञानिकों का मानना है कि आज से करीब 450 करोड़ वर्ष पहले एक उल्कापिंड धरती से टकराया, जिससे इसका कुछ हिस्सा टूट कर अलग हो गया और वही चांद बना। वैज्ञानिकों का मानना है कि धरती से चंद्रमा का सिर्फ 59 फीसदी हिस्सा ही दिखता है। चांद पर वायुमंडल नहीं है, इसलिए वहां जीवन संभव नहीं है। चंद्रमा की सतह पथरीली और बेहद उबड़-खाबड़ है। वहां गुरुत्वाकर्षण भी नहीं है।
चंद्रमा का तापमान
चंद्रमा का तापमान एक तरफ बहुत ही ज्यादा तो वहीं दूसरी तरफ बहुत ही कम है। इसके रोशनी वाले हिस्से का तापमान जहां 180 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, वहीं अंधेरे हिस्से का तापमान -153 डिग्री सेल्सियस हो जाता है। इससे समझा जा सकता है कि चंद्र अभियान कितना कठिन और चुनौतीपूर्ण रहा होगा।
क्या है रहस्य आर्मस्ट्रांग के कदमों के निशान का
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की एरिजोना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्क रॉबिन्सन ने बताया था कि चंद्रमा की सतह चट्टानों और धूल की परत से ढकी है। इसमें इसमें चट्टानों के बारीक कण भी मिले होते हैं। इसलिए चंद्रमा की सतह से किसी के पैरों के निशान हट नहीं सकते। प्रोफेसर रॉबिन्सन का कहना है कि इसकी वजह है चंद्रमा पर वायुमंडल का नहीं होना। चंद्रमा पर वायुमंडल नहीं होने के कारण वहां उतरे अंतरिक्षयात्रियों के पैरों के निशान लाखों वर्षों तक जस के तस मौजूद रहेंगे।
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