भारत के लिए खतरा भी है नेपाल के रास्ते 'बार्डर' तक आने वाली ये सड़क

Published : Nov 03, 2019, 08:13 PM ISTUpdated : Nov 03, 2019, 08:16 PM IST
भारत के लिए खतरा भी है नेपाल के रास्ते 'बार्डर' तक आने वाली ये सड़क

सार

बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के माध्यम से चीन पूरे हिमालयी क्षेत्र में बंदरगाहों, सड़कों, रेलवे और हवाई अड्डों के माध्यम से संचार नेटवर्क का विस्तार करना चाहता है। नेपाल पहले से ही बीआरआई परियोजना के लिए हस्ताक्षर कर चुका है।

काठमांडू. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अक्टूबर अंत में नेपाल दौरे पर थे। दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए हैं जिनमें नेपाल से गुज़रने वाली एक सड़क भी है जो चीन और भारत को जोड़ेगी। यह सड़क चीन को जहां व्यापारिक लाभ पहुंचाएगी वहीं भारत के लिए व्यवसायिक और सामरिक दोनों तरह से नुकसान भी पहुंचा सकती है। इस सड़क से चीन भारत की सीमा के ओर करीब हो जाएगा। हालांकि इस योजना में नेपाल में रेल और सड़क दोनों नेटवर्क का विस्तार शामिल है।

चीन नेपाल में बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के माध्यम से पूरे हिमालयी क्षेत्र में बंदरगाहों, सड़कों, रेलवे और हवाई अड्डों के माध्यम से संचार नेटवर्क का विस्तार करना चाहता है। पहले वह बांग्लादेश से नजदीकी बढ़ाता नजर आ रहा था जो कि भारत का पड़ोसी देश है। अब चीन नेपाल को कई समझौते पर राजी चुका है। ऐसे में भारत और चीन को जोड़ने वाली इस सड़क भी इस समझौते में शामिल हो सकती है। इस सड़क समझौते में तीन बड़ी सड़कों का निर्माण करवाया जाएगा। जिनमें कोसी, गंडकी और कर्णाली कॉरिडोर हैं। इनके निर्माण की चीन की प्रतिबद्धता को नेपाल के विदेश मंत्रालय द्वारा संयुक्त बयान दिया गया था।

मौजूदा समय में नेपाल सिर्फ़ कालीगंड कॉरिडोर का निर्माण स्वयं कर रहा है लेकिन नेपाल द्वारा जारी किये गए इस संयुक्त बयान के बाद ऐसी उम्मीद की जा रही है कि चीन और भारत को जोड़ने वाली दूसरी सड़कों के निर्माण में भी चीन आर्थिक सहायता प्रदान करेगा जो भारत के लिए एक चिंता का विषय है।

क्या चाहता है चीन- 

बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के माध्यम से चीन पूरे हिमालयी क्षेत्र में बंदरगाहों, सड़कों, रेलवे और हवाई अड्डों के माध्यम से संचार नेटवर्क का विस्तार करना चाहता है। नेपाल पहले से ही बीआरआई परियोजना के लिए हस्ताक्षर कर चुका है। अधिकारियों का कहना है कि इस योजना में तीनों सड़कें शामिल होंगी।

कोसी, कालीगंडकी और करनाली कॉरिडोर की ज़्यादातर सड़कों को बेहतर किया गया है। इसी तरह कुछ जगहों पर अतिरिक्त सड़कों का निर्माण करके नेटवर्क का विस्तार करने का भी लक्ष्य है। इसके अलावा सरकार का लक्ष्य इन सड़कों को दो लेन में बनाकर चौड़ा करना भी है। सड़क विभाग के अंतर्गत आने वाले उत्तर-दक्षिण व्यापार मार्ग विस्तार निदेशालय के प्रमुख शिव नेपाल का कहना है इन तीनों अंतर्राष्ट्रीय सड़क निर्माण में सड़कों को अन्य क्षेत्रों में चौड़ा करने की भी ज़रूरत है।

कर्णाली गलियारा सड़क योजना 

नेपाल और चीन के समझौते में यह कॉरिडोर सबसे लंबा है। माना जा रहा है कि यह कॉरिडोर नेपाल के माध्यम से भारत और चीन को जोड़ेगा। इस कॉरिडोर में बनने वाली सड़क की लंबाई 5 किमी होगी। राज्य सरकार के लिए सड़क के 3 किलोमीटर के ट्रैक को खोलना प्राथमिकता है। ऐसा कहा जाता है कि नेपाली सेना शेष ट्रैक को खोलने लिए कुछ हिस्सों में काम कर रही है जबकि कुछ हिस्सों में सड़क विभाग काम कर रहा है।

भारत द्वारा अमेरीका और यूरोपीय संघ का साथ देने के कारण नेपाल में चीन की उपस्थिति बढ़ गई है। चीन ने इसे रणनीतिक ख़तरे के तौर पर लिया और अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए नेपाल में काफ़ी पूंजी निवेश किया। इसीलिए अब नेपाल में चीन की मौजूदगी काफी व्यापक और शक्तिशाली दिखती है।

अब सवाल ये है कि क्या ये भारत के लिए असुरक्षित होने की बात है?

चीन और नेपाल दोनों का दावा है कि इससे दोनों तरफ़ विकास की आमद बढ़ेगी लेकिन इस मौजूदगी को रणनीतिक नज़रिये से भी देखा जाता है। उस नज़रिये से यह बात सच है कि भारत ने नेपाल में बहुत कुछ खोया है। उसकी बड़ी वजह ये है कि भारत ने नेपाल की अंदरूनी राजनीति में काफ़ी दख़ल दिया। भारत जिन माओवादियों को अपने यहां आतंकवादी जैसा मानता है, नेपाल में उसने उनके साथ साझेदारी की और उन्हें समर्थन देकर नेपाल की सत्ता के केंद्र बिंदु में लाने में मदद की। इससे भारत के पारंपरिक सहयोगी माने जाने वाले नेपाली कांग्रेस और नेपाली राजशाही भारत से दूर हो गए थे। 

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