त्रिपुरा में 7 दिन तक चलने वाली खर्ची पूजा का आयोजन शुरू हो गया है। शनिवार को 14 देवी-देवताओं की पूजा के साथ इसकी शुरुआत हुई।

उज्जैन. खर्ची पूजा में लाखों लोग उमड़ते हैं, लेकिन इस बार कोरोना गाइडलाइन के चलते इसमें सीमित लोगों ने ही भाग लिया। प्राचीन समय में धार्मिक आयोजन स्थानीय आदिवासी करते थे, लेकिन बदलते समय के साथ अब यह पूजा केवल आदिवासियों की ही नहीं, अपितु समस्त त्रिपुरावासियों की है। इसमें सभी श्रद्धा तथा आस्था से शामिल होते हैं।

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क्या है इस परंपरा से जुड़ी कथा?
- प्राचीन समय में राजा त्रिलोचन की रानी हीरावती एक दिन नदी पूजा करने जा रही थी, कि उन्हें आवाज सुनायी दी कि, रानी माँ हमें बचाओ, हमारी रक्षा करो। फिर उन्होंने अपना परिचय 14 देवताओं के रूप में दिया।
- देवताओं ने कहा कि हमारे पीछे राक्षस रूपी भैंसा पड़ा है, जिसके डर के कारण हम सेमल के पेड़ पर बैठे हैं। यह सुनकर रानी माँ ने कहा, मैं साधारण स्त्री तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकती हूं।
- देवताओं ने रानी से कहा कि तुम अपना रिया (वक्षस्थल ढकने वाला कपड़ा) इस भैंस पर डाल दोगी तो यह शांत हो जायेगा। उसके बाद इसकी बलि दे देना। रानी ने ऐसा ही किया। इसके बाद रानी इन 14 देवताओं को राजमहल ले आयी।
- तब से ये 14 देवता राज परिवार के साथ-साथ समस्त आदिवासी जाति के कुल देवता हैं। प्रतिवर्ष इसी तिथि को इन चौदह देवताओं की पूजा की जाती है।

जानिए इस परंपरा से जुड़ी अन्य रोचक बातें…
1.
खर्ची पूजा में जिन 14 देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, उनके नाम हर, उमा, हरि, माँ, वाणी, कुमार, गणम्मा, विधि, पृथ्वी, समुद्र, गंगा, शिखी, काम और हिमाद्री है।
2. इन देवताओं की पूर्ण मूर्तियां नहीं हैं केवल सिर की मूर्तियाँ हैं। इनमें 11 मूर्तियाँ अष्टधातु की हैं और शेष तीन मूर्तियां सोने की हैं।
3. इन देवताओं के आदिवासी नाम किसी को मालूम नहीं। केवल मंदिर का पुजारी जिसे चंताई कहते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसका उत्तराधिकारी ही जानता चला आ रहा है।
4. पूजा के दिन मुहूर्त पर चंताई, राजा की वेषभूषा में आगे-आगे चलता है, और इससे आगे होता है उसका अंगरक्षक, जो तलवार-ढाल लेकर चलता है।
5. चंताई के पीछे होते हैं उसके 14 सेवक, जो इन देवताओं की एक-एक मूर्ति गोद में लिए होते हैं। देवताओं को साथ लिए, बाँस के छातों से छाया किये रखते हैं।
6. ये सब दर्शनार्थियों सहित, इन देवताओं की मूर्तियों को पास की पवित्र नदी में स्नान करा कर पूजा स्थल पर स्थापित करते हैं।
7. सबसे आगे प्रदेश सरकार की पुलिस का बैण्ड होता है। पूरी तरह सरकारी देख-रेख में यह सब होता है।
8. चंताई द्वारा पहनी जाने वाली विशेष प्रकार की सोने की माला भी सरकारी ट्रेजरी में सुरक्षित रहती है, जो इन्हीं दिनों खजाने से निकाल कर चंताई को दी जाती है।
9. इस दिन बकरी, मुर्गी, कबूतरों और हंसों की बलि दी जाती है। पुराने समय में नरबलि की प्रथा थी, जिसे राजा गोविंद मानक्य ने १७ वीं सदी में बंद करवा दिया था।
10. खर्ची पूजा स्थल और चौदह देवताओं का मंदिर अगरतला शहर से 15 किलोमीटर दूर उत्तर में खैरनगर के पास है।
11. यह मंदिर राजा कृष्ण मानिक्य ने 18वीं शताब्दी के मध्य बनवाया था। प्राचीन मंदिर अगरतला शहर से 57 किलोमीटर दूर दक्षिण में उदयपुर के पास है।