Geeta Jayanti 2021: जीवन नष्ट कर देती हैं ये 3 बुरी आदतें, ये हैं श्रीमद्भगवद गीता के लाइफ मैनेजमेंट

Published : Dec 12, 2021, 03:51 PM ISTUpdated : Dec 12, 2021, 04:21 PM IST
Geeta Jayanti 2021: जीवन नष्ट कर देती हैं ये 3 बुरी आदतें, ये हैं श्रीमद्भगवद गीता के लाइफ मैनेजमेंट

सार

हिंदू धर्म में अनेक धर्म ग्रंथ हैं। इन सभी से जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं हैं। लेकिन इन सभी में श्रीमद्भगवद गीता (Geeta Jayanti 2021) बहुत ही विशेष है क्योंकि ये एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसकी जयंती मनाई जाती है।

उज्जैन. भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश तब दिया था जब कौरवों और पांडवों की सेना कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने आकर खड़ी हो गई थी। उस समय मोहवश अर्जुन ने शस्त्र त्याग दिए थे। तब गीता के माध्यम से ही भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को धर्मानुसार कर्म करने की प्रेरणा दी। वास्तव में यह उपदेश भगवान श्रीकृष्ण कलयुग के मापदंड को ध्यान में रखते हुए ही दिया है। गीता जयंती (14 दिसंबर, मंगलवार) के अवसर पर हम आपको गीता के कुछ चुनिंदा प्रबंधन सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार है…

श्लोक 1
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तरमादेतत्त्रयं त्यजेत्।।
अर्थ- काम, क्रोध व लोभ। यह तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात् अधोगति में ले जाने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

मैनेजमेंट सूत्र
काम यानी इच्छाएं, गुस्सा व लालच ही सभी बुराइयों के मूल कारण हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हें नरक का द्वार कहा है। जिस भी मनुष्य में ये 3 अवगुण होते हैं, वह हमेशा दूसरों को दुख पहुंचाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगे रहते हैं। अगर हम किसी लक्ष्य को पाना चाहते हैं तो ये 3 अवगुण हमें हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए। क्योंकि जब तक ये अवगुण हमारे मन में रहेंगे, हमारा मन अपने लक्ष्य से भटकता रहेगा।


श्लोक 2
विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।
अर्थ- जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।

मैनेजमेंट सूत्र
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।

 

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