Saphala Ekadashi 2021: गुरुवार और एकादशी का शुभ योग 30 दिसंबर को, ये है पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, कथा और महत्व

Published : Dec 27, 2021, 06:28 PM IST
Saphala Ekadashi 2021: गुरुवार और एकादशी का शुभ योग 30 दिसंबर को, ये है पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, कथा और महत्व

सार

धर्म ग्रंथों के अनुसार, पौष मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को सफला एकादशी (Saphala Ekadashi 2021) कहते हैं। इस बार यह एकादशी 30 दिसंबर, गुरुवार को है। गुरुवार को एकादशी होने से ये बहुत और भी शुभ फल प्रदान करने वाला रहेगा क्योंकि ये तिथि और वार दोनों के ही स्वामी भगवान विष्णु हैं।

उज्जैन. इस बार 30 दिसंबर को गुरुवार और एकादशी के साथ-साथ प्रवर्ध नाम के शुभ योग का संयोग बन रहा है। इस शुभ संयोग में भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी तरह के कामों में सफलता मिलेगी और गुरु ग्रह से संबंधित दोषों का निराकरण भी होगा। इस व्रत को करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि भी बनी रहेगी। 

व्रत तिथि और पारण मुहूर्त
एकादशी तिथि 29 दिसंबर को दोपहर 04.12 से प्रारंभ होगी, 30 दिसंबर को दोपहर 01.40 पर खत्म होगी। व्रत का पारण 31 दिसंबर को करना चाहिए।

इस विधि से करें सफला एकादशी का व्रत...
- सफला एकादशी (30 दिसंबर) की सुबह स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। इसके बाद माथे पर चंदन लगाकर फूल, फल, गंगा जल, पंचामृत व धूप-दीप से भगवान लक्ष्मीनारायण की पूजा व आरती करें।
- भगवान श्रीहरि के विभिन्न नाम-मंत्रों को बोलते हुए भोग लगाएं। पूरे दिन निराहार (बिना कुछ खाए-पिए) रहें, शाम को दीपदान के बाद फलाहार कर सकते हैं। रात को जागरण करें।
- द्वादशी तिथि (31 दिसंबर) को भगवान की पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन करवा कर जनेऊ एवं दक्षिणा देकर विदा करने के बाद ही स्वयं भोजन करें। इस प्रकार सफला एकादशी का व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

दुख और दुर्भाग्य से मुक्ति देने वाला व्रत
मान्यता है कि सभी प्रकार के दुखों और दुर्भाग्य से मुक्ति दिलाने वाले सफला एकादशी का व्रत महाभारत काल में युधिष्ठिर ने भी किया था। अत: विधि-विधान और श्रद्धा, विश्वास के साथ एकादशी व्रत व पूजा-पाठ करने पर भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

सफला एकादशी व्रत की कथा
मान्यता है कि प्राचीनकाल में चंपावती नगरी के राजा महिष्मान का सबसे बड़ा पुत्र लुंपक बहुत ही दुष्ट व अधार्मिक था। इस कारण पिता ने उसे राज्य से निकाल दिया था। जंगलों में भटकते हुए लुंपक, पशु मांस व फल आदि खाकर जीवित रहा। मान्यता है कि पौष माह के कृष्णपक्ष की सफला एकादशी पर लुंपक ने कुछ फल इकट्ठे कर पीपल के वृक्ष के नीचे अनजाने में ही कहा कि इन फलों से भगवान विष्णु संतुष्ट हों। इस तरह अनजाने में ही दुराचारी लुंपक से भगवान की कृपा दिलाने वाली सफला एकादशी व्रत संपन्न हुआ और उसे राज्य, धन, संपत्ति, समेत सभी सुख मिले। अत: मान्यता है कि पूर्ण मनोयोग से व्रत करें तो साधक की समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

 

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