Mahakal Lok: उज्जैन सिंहस्थ महाकुंभ में बनते हैं ‘खूनी नागा’, क्या आप जानते हैं इस नाम के पीछे का रहस्य?

Published : Oct 10, 2022, 04:18 PM ISTUpdated : Oct 11, 2022, 07:53 PM IST
Mahakal Lok: उज्जैन सिंहस्थ महाकुंभ में बनते हैं ‘खूनी नागा’, क्या आप जानते हैं इस नाम के पीछे का रहस्य?

सार

Mahakal Lok: उज्जैन में हर 12 साल में कुंभ का मेला आयोजित होता है। इसे सिंहस्थ भी कहा जाता है। देश में सिर्फ 4 स्थानों पर ही ये धार्मिक मेला लगता है। इन चारों का ही महत्व धर्म ग्रंथों में बताया गया है।  

उज्जैन. उज्जैन का महाकाल मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हाल ही में इसके विस्तारीकरण का काम पूरा हुआ है। इस प्रोजेक्ट को महाकाल लोक (Mahakal Lok) का नाम दिया गया है। 11 अक्टूबर, मंगलवार को इसका लोकार्पण देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने किया। उज्जैन सिर्फ महाकाल मंदिर (Mahakal Temple)  के कारण ही प्रसिद्ध नहीं हैं और भी कई बातें इसे विशेष बनाती हैं, जैसे यहां हर 12 साल में लगने वाला सिंहस्थ महाकुंभ। ये एक धार्मिक मेला होता है जो देश में सिर्फ 4 स्थानों पर ही लगता है। ये मेला एक महीने तक चलता है। इस दौरान देश भर के बड़े-बड़े साधु-महात्मा यहां आते हैं और क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाकर स्वयं को धन्य मानते हैं। उल्लेखनीय है कि उज्जैन के कुंभ में जो नागा बनते हैं, उन्हें ‘खूनी’ नागा कहा जाता है। आगे जानिए उज्जैन में लगने वाले सिंहस्थ महाकुंभ से जुड़ी कुछ खास बातें…  

जानें कुंभ की कथा
धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक बार देवताओं व दानवों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले। अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत का घड़ा लेकर प्रकट हुए। अमृत कुंभ के देवताओं और दैत्यों में युद्ध होने लगा। ये युद्ध लगातार 12 दिन तक चलता रहा। इस लड़ाई के दौरान पृथ्वी के 4 स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत की बूँदें गिरी। लड़ाई शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर छल से देवताओं को अमृत पिला दिया। अमृत पीकर देवताओं ने दैत्यों को मार भगाया। काल गणना के आधार पर देवताओं का एक दिन धरती के एक साल के बराबर होता है। इस कारण हर 12 साल में इन चारों जगहों पर महाकुंभ का आयोजन किया जाता है।

उज्जैन में महाभारत काल में हो रहा है कुंभ
सांदीपनि मुनि चरित्र स्तोत्र के अनुसार, महर्षि सांदीपनि पहले काशी में रहते थे। एक बार प्रभास क्षेत्र से लौटते हुए वे उज्जैन आए। उस समय यहां कुंभ मेले का समय था। लेकिन भयंकर अकाल के कारण साधु-संत बहुत परेशान थे। तब महर्षि सांदीपनि ने तपस्या कर यहां बारिश करवाई, जिससे अकाल खत्म हो गया। तब से महर्षि सांदीपनि इसी स्थान पर ठहर गए और विद्यार्थियों को शिक्षा देने लगे। आज भी उज्जैन में महर्षि सांदीपनि का आश्रम स्थित है। मान्यता है कि इसी आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण बलराम ने शिक्षा प्राप्त की थी।

उज्जैन में  बनते हैं खूनी नागा
देश में जहां-जहां भी कुंभ मेले का आयोजन किया जाता हैं, वहां नागा साधुओं को दीक्षा भी दी जाती है। प्रयाग (इलाहाबाद) के महाकुंभ में दीक्षा लेने वालों को नागा, उज्जैन में दीक्षा लेने वालों को खूनी नागा, हरिद्वार में दीक्षा लेने वालों को बर्फानी व नासिक में दीक्षा वालों को खिचड़िया नागा के नाम से जाना जाता है। इन सभी नामों के पीछे अलग-अलग कारण हैं। ऐसा कहते हैं कि उज्जैन में दीक्षा लेने वाले नागा धर्म की रक्षा करने वाले सैनिक हैं और ये इसके लिए खून भी बहा सकते हैं। इसलिए इन्हें खूनी नागा कहा जाता है।

इन ग्रह स्थितियों में लगता है सिंहस्थ महाकुंभ
धर्म ग्रंथों के अनुसार, विशेष ग्रह स्थितियों पर ही उज्जैन सहित अन्य स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। उज्जैन में जिस समय कुंभ मेला आयोजित किया जाता है, उस समय गुरु सिंह राशि में होता है, इसलिए इसे सिंहस्थ भी कहते हैं। उस समय ग्रहों की स्थिति ऐसी रहती है-
मेषराशि गते सूर्ये, सिंहराश्यां बृहस्पतौ।
उज्जयिन्यां भवेत्कुंभ सर्वसौख्य विवर्धनः।।
मेषराशि गते सूर्ये, सिंहराश्यां बृहस्पतौ।
कुंभयोगसविज्ञेयः भुक्तिमुक्ति प्रदायकः।।
अर्थ- सिंह राशि के गुरु में मेष का सूर्य आने पर उज्जयिनी (उज्जैन) में कुंभ पर्व मनाया जाता है। ये पर्व हर तरह की सिद्धि प्रदान करने वाला है। 



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