क्या भीम ने सचमुच पीया था दु:शासन का खून, क्या हुआ जब युद्ध के बाद गांधारी और धृतराष्ट्र से मिले पांडव?

Published : Jan 22, 2020, 09:58 AM IST
क्या भीम ने सचमुच पीया था दु:शासन का खून, क्या हुआ जब युद्ध के बाद गांधारी और धृतराष्ट्र से मिले पांडव?

सार

महाभारत युद्ध में भीम ने दुर्योधन के छोटे भाई दु:शासन का वध किया था। इसके बाद भीम ने छाती फाड़कर उसका खून भी पीया था।

उज्जैन. भीम के द्वाराा दु:शासन का खून पीने का प्रसंग तो सभी जानते हैं, लेकिन इस घटना से जुड़ी कुछ बातें ऐसी भी हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको महाभारत से जुड़ी कुछ ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं-

भीम के दांतों से आगे नहीं गया दु:शासन का खून
महाभारत के अनुसार, युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव जब धृतराष्ट्र व गांधारी से मिलने गए। गांधारी दुर्योधन के अन्याय पूर्वक किए गए वध से बहुत गुस्से में थीं। भीम ने गांधारी को समझाया कि- यदि मैं अधर्मपूर्वक दुर्योधन को नहीं मारता तो वह मेरा वध कर देता।
गांधारी ने कहा कि- तुमने दु:शासन का खून पिया, क्या वह सही था? तब भीम ने कहा कि- जब दु:शासन ने द्रौपदी के बाल पकड़े थे, उसी समय मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की थी। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता तो क्षत्रिय धर्म का पालन नहीं कर पाता। लेकिन दु:शासन का खून मेरे दांतों से आगे नहीं गया।

काले हो गए थे युधिष्ठिर के नाखून
भीम के बाद युधिष्ठिर गांधारी से बात करने के लिए आगे आए। गांधारी उस समय क्रोध में थीं। जैसे ही गांधारी की नजर पट्टी से होकर युधिष्ठिर के पैरों के नाखूनों पर पड़ी, वह काले हो गए। यह देख अर्जुन श्रीकृष्ण के पीछे छिप गए और नकुल, सहदेव भी इधर-उधर हो गए। थोड़ी देर बाद जब गांधारी का क्रोध शांत हो गया, तब पांडवों ने उनसे आशीर्वाद लिया।

भीम की हत्या करना चाहते थे धृतराष्ट्र
गांधारी से मिलने के बाद पांडव धृतराष्ट्र से मिलने गए। दुर्योधन की मृत्यु को याद कर धृतराष्ट्र भीम का वध करना चाहते थे। श्रीकृष्ण ये बात ताड़ गए और उन्होंने धृतराष्ट्र से गले मिलने के लिए भीम की लोहे की प्रतिमा आगे कर दी। धृतराष्ट्र ने उस लोहे की प्रतिमा को ही भीम समझकर अपनी भुजाओं के बल से तोड़ डाला। उन्हें लगा कि भीम की मृत्यु हो चुकी है। यह सोच कर वे दु:खी हुए। जब श्रीकृष्ण ने देखा कि धृतराष्ट्र का क्रोध शांत हो गया है, तो उन्होंने कहा कि भीम जीवित है। आपने भीम की प्रतिमा को नष्ट किया है। यह जानकर धृतराष्ट्र को संतोष हुआ।
 

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